मेरठ। मेडा की मुसीबत नगर निगम के गले पड़ने जा रही है। मेरठ विकास प्राधिकरण के तेरह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट यानि एसटीपी नगर निगम को हस्तांतरित किए जा रहे हैं। इसका विरोध हो रहा है। विराेध करने वाले पार्षदों का तर्क है कि जो चीजें विकास प्राधिकरण नहीं संचालित कर पाता है, उनको नगर निगम के मत्थे मढ़ दिया जाता है। मेरठ विकास प्राधिकरण की तीन बड़ी आवाासीय योजनाएं जिनमें शताब्दीनगर, वेदव्यासपुरी और लोहिया नगर शामिल हैं, इसी तर्ज पर निगम को हस्तांतरित की गयीं। जो स्टाफ वहां काम कर रहा था उसको हट दिया गया और अब तीनों आवासीय योजनाओं की मुसीबत नगर निगम के गले पड़ी हुई है। ऐसा ही कुछ अब सीवेट ट्रीटमेंट प्लांटों को लेकर होने जा रहा है।
महानगर में प्राधिकरण के कुल तेरह सीवजे ट्रीटमेट प्लांट हैं। इनका संचालन अभी तक विकास प्राधिकरण कर रहा था, लेकिन अब ये निगम के खाते में दर्ज होने जा रहे हैं। नगर निगम के पास पहले से ही अपने एसटीपी हैं जिनका संचालन किया जा रहा है, इनमें तेरह का और इजाफा किए जाने के बाद जिन संसाधनों की जरूरत होगी उस को लेकर विकास प्राधिकरण और निगम के अफसर चुप हैं। निगम के तमाम पार्षदों का विरोध इसी को लेकर है। उनका कहना है कि पर्याप्त तकनीकी संसाधन और स्टाफ की कमी के बावजूद निगम पर अतिरिक्त जिम्मेदारी डाली जा रही है, जिससे भविष्य में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों का संचालन प्रभावित होगा। नगर निगम में वर्तमान में उपलब्ध जूनियर इंजीनियर और सहायक अभियंता पहले से ही शहर के 90 वार्डों का कार्यभार संभाल रहे हैं। ऐसे में तेरह सीवेज प्लांटों प्लांटों के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी उन्हीं अधिकारियों के कंधों डाली जाएगी।
जो तेरह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नगर निगम को सौंपे जा रहे हैं उनके संचालन के लिए स्टाफ के सवाल पर सभी चुप्पी साधे हुए हैं। पार्षद संजय सैनी व कीर्ति भोपला व पूर्व पार्षद अब्दुल गफ्फार का कहना है कि इस कार्य के लिए अतिरिक्त तकनीकी स्टाफ की आवश्यकता होगी। विकास प्राधिकरण और नगर निगम के बीच हुए समझौते के तहत पहली किश्त में करीब 15 करोड़ रुपये नगर निगम को दिए जाने हैं। इसके बाद अन्य किश्तों में भी धनराशि हस्तांतरित की जाएगी। वहीं जलकल विभाग को प्रतिवर्ष एक करोड़ रुपये दिए जाने का प्रावधान बताया गया है। इन प्लांटों के संचालन के लिए बिजली, ट्रांसफार्मर मरम्मत, डीजल और अन्य तकनीकी खर्चे निगम पर अतिरिक्त बोझ की तरह बढ़ जाएंगे। इसको लेकर भी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं। यदि किसी प्लांट का ट्रांसफार्मर खराब हो जाए तो उसे तत्काल बदलने में लाखों रुपये का खर्च आता है। इसके अलावा कई प्लांटों में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में डीजल की खपत भी होती है।
संसाधनों पर अफसरों की चुप्पी
उक्त पार्षदाें का कहना है कि निगम की वर्तमान व्यवस्था इस तरह के बड़े तकनीकी प्रोजेक्ट को प्रभावी ढंग से संचालित करने में सक्षम नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि पर्याप्त इंजीनियरिंग स्टाफ और संसाधनों की व्यवस्था नहीं की गई तो प्लांटों का संचालन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने पूर्व में कूड़ा निस्तारण और अन्य परियोजनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि योजनाओं के सफल क्रियान्वयन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। वहीं दूसरी ओर बताया गया है कि हस्तांतरण संबंधी करारनामे पर जलकल विभाग और संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर हो चुके हैं।
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