करोड़पति व लखपतियों का संगठन पर होगा कब्जा,क्या मेहनती कार्यकर्ताओं को मिलेगा सम्मान
प्रवीण शर्मा हापुड़— यदि जिले की राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो यह सच सामने आता है कि धनबल का प्रभाव लंबे समय से राजनीति और संगठनों पर हावी रहा है। समय-समय पर इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं, जहां शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं द्वारा यह तक कहा गया कि संगठन चलाने में पैसे वालों की भूमिका अहम होती है, जबकि मेहनती और ईमानदार कार्यकर्ता अक्सर हाशिये पर चले जाते हैं। ऐसे माहौल में ईमानदारी और निष्ठा के साथ काम करने वालों के हाथ कई बार निराशा ही लगती है।लेकिन इस बार हापुड़ जिले की राजनीति में एक अलग तस्वीर उभरती दिखाई दे रही है। राजनीतिक दलों में पूंजीपतियों के दबदबे के बीच पार्टी नेतृत्व ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि केवल धनबल ही राजनीति का आधार नहीं है। जानकारों का मानना है कि बिना संसाधनों के राजनीति कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। देश और प्रदेश की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने अपने समर्पण के बल पर ऊंचे मुकाम हासिल किए और उनकी राजनीति राष्ट्रहित व जनहित से जुड़ी रही। आज के दौर में हालांकि कुछ नेता धनबल के सहारे राजनीति करते हुए शीर्ष नेतृत्व के करीबी होने का रौब जमाते नजर आते हैं। इसी पृष्ठभूमि में प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा जिले के अध्यक्ष पद की घोषणा भले ही एक वर्ष के विलंब से की गई हो, लेकिन इसका असर सकारात्मक रहा। मेहनती और ईमानदार कार्यकर्ताओं में इससे खुशी की लहर दौड़ गई। इस बार पार्टी ने जिले की कमान मेहनती और ईमानदार महिला कार्यकर्ता कविता माधरे को सौंपकर यह साफ कर दिया कि संगठन में निष्ठा और परिश्रम की भी कद्र है। उनके नेतृत्व से न केवल संगठनात्मक मजबूती की उम्मीद जगी है, बल्कि उनका राजनीतिक भविष्य भी उज्ज्वल नजर आने लगा है। हालांकि, जिले की कमेटी में पहले से प्रभावशाली और पूंजीपतियों के वर्चस्व ने कहीं न कहीं जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा है, जिसका खामियाजा पार्टी को भविष्य में उठाना पड़ सकता है। कुछ दागी और बागी नेताओं के दावे भी संगठन को सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। कुल मिलाकर, हापुड़ की राजनीति में यह फैसला बदलाव का संकेत जरूर देता है, अब देखना यह है कि यह भरोसा जमीनी स्तर पर कितना असर दिखाता है।
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