मेरठ/कैंट बोर्ड के अफसरों की लापरवाही के चलते सरकारी खजाने पर बयाज की मार पड़ी। मामला कर्मचारियों के पीएफ की रकम से जुड़ा है, जिसका पैसा वक्त पर नहीं जमा किया गया, नतीजा यह हुआ कि बोर्ड को कर्मचारियों के पीएफ के साथ ब्याज भी भरना पड़ा। हालांकि बोर्ड के खजाने पर पड़ी ब्याज की मार से फायदा बोर्ड के कर्मचरियों को हुआ।
यह है पूरा मामला
साल २०२२ में कैंट बोर्ड में वर्कफोर्स कंपनी काम करती थी, लेकिन कुछ कारणों के चलते ठेकेदार बीच में ही काम छोड़कर चला गया। उसके बाद कैंट बोर्ड ने अपनी ओर से कुछ कर्मचारियों को लगा दिया, हालांकि ये सभी कर्मचारी वो बताए जाते हैं जो वर्कफोर्स कंपनी ने लगाए थे। इन कर्मचारियों के पीएफ का पैसा कटता था, लेकिन बोर्ड के नीचे के कुछ अफसरों की लापरवाही के चलते पीएफ की रकम समय पर जमा नहीं की गई और जब अरसा बीत जाने के बाद पीएफ का चेक भेजा गया तो वह पीएफ फंड से लौटा दिया गया, लौटाया इसलिए गया क्योंकि कर्मचारियों के फंड की जितनी रकम चेक में भरी गयी थी पीएफ फंड के अफसरों ने कैंट बोर्ड से उसमें देरी होने के चलते बयाज की रकम भी जोड़ने को कहा। बाद में बयाज की रकम जोड़कर चेक भेजा गया तब कही जाकर उसको स्वीकार किया गया। पीएफ का पैसा अब कर्मचारियों के एकाउंट में पहुुंच गया है। कैंट बोर्ड के खजाने पर जो यह अतिरिक्त भार पड़ा है इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा क्या उस पर कैंट बोर्ड प्रशासन इस देरी के लिए कार्रवाई करेगा, जिसकी वजह से सरकारी खजाने पर वित्तीय भार पड़ा है।
नौबत बस यहीं तक नहीं
सरकारी खजाने पर इस चाबुक की यह नौबत यहीं तक नहीं रही। दरअसल जब ठेका खत्म हुआ तो उसके बाद ठेकेदार को एक बड़ी रकम का भुगतान किया गया। लेकिन उस रकम में से कैंट बोर्ड का संबंधित अनुभाग सिक्योरिटी राशि की रकम जो करीब चालिस लाख बतायी जाती है वह काटना भूल गया और पूरी रकम का चैक बना दिया गया। सरकारी खजान े को यह दूसरा झटका था। आमतौर पर ऐसा तब होता है जब कैंट बोर्ड के हित के बजाए ठेकेदार के हित को तरजीह दी जाती है।
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