बकाए के नाम पर पीवीवीएनएल हो या यूपी की कोई दूसरी विद्युत वितरण कंपनी अब उपभोक्ताओं को परेशान नहीं कर सकेगी
मेरठ। बकाए के नाम पर पीवीवीएनएल हो या यूपी की कोई दूसरी विद्युत वितरण कंपनी अब उपभोक्ताओं को परेशान नहीं कर सकेगी। बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 56(2) के तहत यदि किसी राशि का बिल समय पर नहीं भेजा गया और उसे लगातार बकाया के रूप में नहीं दर्शाया गया, तो दो साल के बाद उसकी मांग नहीं की जा सकती। सुप्रीमकोर्ट ने बकाए के नाम पर उपभोक्ताओं को परेशान करने की कार्रवाई पर पहरा बैठा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें सालों पुराना लगभग 57 लाख रुपये से अधिक का बकाया मांगा गया था। मामला यूपी के एक उपभोक्ता से जुड़ा है, हालांकि इसका यह मतलब कतई ना समझा जाए कि का मतलब यह नहीं है कि बिजली कंपनी किसी भी पुराने बकाये की हर परिस्थिति में वसूली नहीं कर सकती। मुख्य बात यह है कि सेक्शन 56/2 के तहत दो साल के बकाए की रिकबरी के लिए लगातार बकाए दिखाए जाने की शर्त पूरी होनी चाहिए। इसलिए उपभोक्ताओं के पुराने बिजली बकाये के विवाद में बिजली बिलों का पूरा रिकॉर्ड और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कथित बकाया बाद के बिलों में लगातार दर्ज था या नहीं। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की वितरण कंपनी की करीब ₹57.74 लाख की मांग को समय-सीमा से बाधित माना। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश की बिजली वितरण कंपनी दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की अपील पर सुनवाई की।
ये है पूरा मामला
मामला उत्तर प्रदेश की वितरण कंपनी दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड और उसके उपभोक्ता के बीच बिजली शुल्क को लेकर था। उपभोक्ता के लिए पहले 2000 केवीए लोड की व्यवस्था थी और बाद में कंपनी ने अतिरिक्त 2000 KVA लोड देने की पेशकश की थी। उपभोक्ता ने अतिरिक्त लोड लेने में रुचि नहीं दिखाई और उसे वास्तव में इस्तेमाल भी नहीं किया। इसके बावजूद कंपनी ने फरवरी 1998 से सितंबर 1998 की अवधि के लिए ₹57,74,164 का मेक्सीमम कंजम्शन गारंटी चार्ज मांग लिया। दरअसल …इस मामले में विवादित राशि से जुड़ी अवधि 1998 की थी, वितरण कंपनी ने पहली बार 13 फरवरी 2007 को मांग उठाई। यानी कथित देनदारी और मांग के बीच लगभग नौ साल का अंतर था। ऐसे में उपभोक्ता ने इस मांग को चुनौती दी। बिजली कानून के सेक्शन 56 (2) के तहत इसे समय-सीमा से बाधित मानते हुए मांग को खारिज कर दिया। इस प्रावधान के अनुसार…किसी उपभोक्ता से कोई देय राशि उसके पहली बार बकाए होने की तारीख से दो साल बाद वसूली नहीं की जा सकती। इसका अपवाद तब है जब उस राशि को लगातार बिजली शुल्क के बकाए राशि के रूप में दिखाया गया हो। इसलिए दो साल की सीमा के बाद वसूली के लिए लगातार बकाए दिखाए जाने की शर्त महत्वपूर्ण बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वैधानिक आवश्यकता को मौजूदा मामले में लागू किया। अदालत ने माना कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे साबित हो कि 1998 से 2007 तक राशि लगातार बकाए के रूप में दिखाई गई थी। इसलिए 13 फरवरी 2007 को पहली बार उठाई गई मांग समय-सीमा के कारण वर्जित थी। जिसकी चर्चा इलेक्ट्रिकसिटी एक्ट की धारा 56/2 करती है। कोर्ट ने यह तथ्य भी ध्यान में रखा कि अतिरिक्त 2000 केवीए लोड फेसेलिटी वास्तव में उपभोक्ता ने इस्तेमाल नहीं की थी। नियमित बिजली बिल जारी होते रहे, लेकिन अतिरिक्त 2000 केवीए से संबंधित राशि उन बिलों में नहीं दिखाई गई।
बिजली कंपनी की अपील खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने वितरण कंपनी की अपील खारिज करते हुए हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने माना कि पुराने बकाये को दो साल की सीमा के बाद वसूलने के लिए उसे लगातार महीने के बिल में बकाये रकम के तौर पर दिखाना जरूरी है।
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