ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान वीवीआईपी विदेशी मेहमानों के रूट की दोनों साइडों को पर्दे से ढक दिया जाना क्या डिजिटल युग में मोदी सरकार देश की आर्थिक हालत को वाकई छिपा सकती है
नई दिल्ली। एक ओर जीडीपी को लेकर पीएम मोदी के दावे दूसरी ओर नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान वीवीआईपी विदेशी मेहमानों के रूट की दोनों साइडों को पर्दे से ढक दिया जाना क्या डिजिटल युग में मोदी सरकार देश की आर्थिक हालत को वाकई छिपा सकती है। यह सवाल पूछा जा रहा है। यह एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण सवाल है, जिस पर समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों और विचारकों के बीच लंबे समय से बहस चल रही है। संक्षेप में कहें तो, वैश्विक कूटनीति में पर्दों के पीछे झुग्गियों को छिपाने से जमीनी सच्चाई को दुनिया से कभी नहीं छिपाया जा सकता। किसी शहर की मुख्य सड़कों पर पर्दे लगाकर विदेशी मेहमानों की कारों के सामने से गरीबी को कुछ घंटों या दिनों के लिए भले ही ओझल कर दिया जाए, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यह छिप नहीं सकता। अंतरराष्ट्रीय पत्रकार, स्वतंत्र मीडिया और खुद वहां के स्थानीय नागरिक स्मार्टफ़ोन के जरिए उन पर्दों और उनके पीछे की झुग्गियों की तस्वीरें और वीडियो तुरंत दुनिया के सामने ला देते हैं।
तेजी से ज्यादा है ध्यान
विरोधाभास यह होता है कि पर्दे लगाने की इस प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान उस गरीबी पर और भी अधिक तेजी से जाता है, जिसे छिपाने की कोशिश की जा रही थी। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और निवेशक किसी देश की वास्तविक स्थिति को सड़कों की चमक-दमक से नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों से आंकते हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN), विश्व बैंक (World Bank), और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसे संगठन किसी भी देश की प्रति व्यक्ति आय, कुपोषण दर, बेरोजगारी और मानव विकास सूचकांक (HDI) की बारीक निगरानी करते हैं। ये आंकड़े दुनिया के सामने देश की आर्थिक और सामाजिक असमानता को पूरी तरह स्पष्ट कर देते हैं।
दिखावे से फायदा क्या
वैश्विक मंचों पर ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) का नेतृत्व करते हुए भारत खुद इस बात को स्वीकार करता है कि विकासशील देशों में गरीबी उन्मूलन अभी एक अधूरा मिशन है। इसलिए, वीआईपी रूटों पर किया जाने वाला यह प्रशासनिक सौंदर्यीकरण एक अस्थायी कूटनीतिक औपचारिकता (Protocol) बनकर रह जाता है, कोई इसे देश की संपूर्ण हकीकत नहीं मानता।
निष्कर्ष
पर्दे लगाने जैसे कदम केवल एक अस्थायी प्रशासनिक प्रयास होते हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था बनी रहे। लेकिन गरीबी जैसी गहरी सामाजिक चुनौती को केवल ठोस नीतियों, रोजगार के अवसरों, पक्के मकानों और समावेशी विकास (Inclusive Growth) के जरिए ही मिटाया जा सकता है, पर्दों से नहीं। वास्तविक प्रगति तब मानी जाती है जब छिपाने के लिए कोई झुग्गी बचे ही नहीं। इस विषय पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के दौरान शहरों का ऐसा अस्थायी सौंदर्यीकरण (Beautification) पूरी तरह गलत है, या सुरक्षा और देश की छवि के लिए इसके कुछ प्रशासनिक फायदे भी होते हैं? कमेट में जरूर बताएं।
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