इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के उपाध्यक्ष संजय मीणा द्वारा बीमारी का हवाला देकर व्यक्तिगत पेशी से छूट मांगने पर कड़ा रुख अपनाया
मेरठ। हाईकोर्ट के आदेश पर अदालत के आदेश के बाद सीएमओ डॉ. राम प्रसाद ने जिला अस्पताल के डॉक्टरों की टीम के साथ मेरठ विकास प्राधिकरा के उपाध्यक्ष संजय मीणा के आवास पर जाकर मेडिकल परीक्षण किया और आवश्यक जांच हेतु रक्त (ब्लड) के नमूने भी लिए। इस मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई तय करेगी। दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के उपाध्यक्ष संजय मीणा द्वारा बीमारी का हवाला देकर व्यक्तिगत पेशी से छूट मांगने पर कड़ा रुख अपनाया और सीएमओ व सीजेएम को उनके स्वास्थ्य की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। इस रिपोर्ट के आने के बाद ही आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट होगा कि वह सचमुच गंभीर रूप से बीमार हैं या केवल अदालत में पेशी से बचने का प्रयास कर रहे थे। मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के वेदव्यासपुरी आवासीय योजना में प्लॉट आवंटन से जुड़े इस मामले में मूल याचिकाकर्ता अनिल कुमार हैं। यह पूरा विवाद प्लॉट आवंटन, प्राधिकरण की मनमानी और नियमों के उल्लंघन से जुड़ा हुआ है। मूल आवंटन शर्तों के तहत याचिकाकर्ता (अनिल कुमार) को प्लॉट आवंटित किया गया था। लेकिन, प्राधिकरण के अफसरों ने कथित तौर पर इस आवंटन को रद्द कर दिया। इतना ही नहीं आवंटी का आरोप है कि गलत तरीके से दोबारा नीलामी की गयी जब मामला कोर्ट में लंबित था और अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था, इसके बावजूद मेडा ने उस प्लॉट की दोबारा नीलामी कर दी और किसी अन्य खरीदार के पक्ष में सेल डीड (बिक्री विलेख) भी निष्पादित कर दी। मेरठ विकास प्राधिकरण प्रशासनक की इस हिमाकत पर हाईकोर्ट ने कड़ा रूख अपनाया और वीसी को तलब कर लिया। हाईकोर्ट ने माना कि जब मामला कोर्ट में था, तब मेडा द्वारा दोबारा नीलामी करना पूरी तरह गैर-कानूनी और अदालत की अवहेलना था। कोर्ट ने उस अवैध नीलामी को रद्द करते हुए मेडा को फटकार लगाई कि वह अपनी गलतियों का फायदा खुद नहीं उठा सकता। यह भी सुनने में आया है कि मेडा के सचिव को हाईकोर्ट ने इलाहाबाद न छोड़ने के आदेश दिए हैं, लेकिन इसकी अधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
ये है पूरा मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के उपाध्यक्ष संजय मीणा द्वारा बीमारी का हवाला देकर व्यक्तिगत पेशी से छूट मांगने पर कड़ा रुख अपनाया और सीएमओ व सीजेएम को उनके स्वास्थ्य की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। प्राधिकरण उपाध्यक्ष संजय मीणा अदालत में पेश नहीं हुए और उनकी तरफ से बीमारी का हवाला देकर व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट का आवेदन दिया गया, जबकि उनकी जगह मेडा सचिव अर्पित गुप्ता कोर्ट में उपस्थित हुए। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि वीसी असल में बीमार नहीं हैं बल्कि अपने दफ्तर में ही मौजूद हैं। रिपोर्ट आज सुबह हाईकोर्ट में दाखिल की गयी। जबकि सुनवाई दोहपर बाद होनी तय की गयी।
अदालत ने जतायी नाराजगी
इस पर नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला और न्यायमूर्ति जेजे मुनीर) ने मेरठ के सीएमओ और स्पेशल सीजेएम को निर्देश दिया कि वे तुरंत उपाध्यक्ष के रक्षापुरम स्थित आवास पर जाएं, उनके स्वास्थ्य की जांच करें और 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश करें। अदालत के आदेश के बाद सीएमओ डॉ. राम प्रसाद ने जिला अस्पताल के डॉक्टरों की टीम के साथ मेडा वीसी के आवास पर जाकर मेडिकल परीक्षण किया और आवश्यक जांच हेतु रक्त (ब्लड) के नमूने भी लिए। इस मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई तय करेगी। दरअसल हुआ यह कि सोमवार को न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला और न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की खंडपीठ के सामने मामले की सुनवाई हुई। संजय मीना की ओर से बीमारी का हवाला देते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट का पत्र पेश किया गया। उनकी जगह मेडा सचिव अर्पित गुप्ता कोर्ट में मौजूद थे। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि संजय मीना बीमार नहीं हैं, बल्कि अपने कार्यालय में बैठे हैं। इस पर कोर्ट ने संजय मीना के दावे पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि क्या संजय मीना वाकई इतने बीमार हैं कि मंगलवार को भी अदालत में नहीं आ सकते। कोर्ट ने सीजेएम मेरठ और सीएमओ मेरठ को आदेश दिया कि वे उपाध्यक्ष के घर जाकर उनके स्वास्थ्य की जांच करें और 24 घंटे में रिपोर्ट दें। कोर्ट ने सचिव अर्पित गुप्ता को मंगलवार की सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का भी आदेश दिया। कोर्ट के आदेश पर सीएमओ डॉ. राम प्रसाद ने जिला अस्पताल के डॉक्टरों की एक टीम बनाई। टीम ने सीएमओ के साथ रक्षापुरम स्थित मेडा उपाध्यक्ष के आवास पर जाकर उनका स्वास्थ्य परीक्षण किया और खून के नमूने लिए।
झूठ साबित होने पर कार्रवाई तय
यदि सीएमओ की रिपोर्ट में यह साबित हो जाता है कि मेडा वीसी संजय मीणा बीमार नहीं थे और उन्होंने कोर्ट में पेश न होने के लिए झूठा बहाना बनाया था, तो उनके खिलाफ कोर्ट को गुमराह करने और झूठा हलफनामा या बहाना पेश करने के लिए अधिकारियों पर ‘क्रिमिनल कंडेम्प्ट’ (आपराधिक अवमानना) का केस चल सकता है, जिसमें जेल या जुर्माना दोनों का प्रावधान है। हाईकोर्ट उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव (आवास) को मेडा अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांचबैठाने और उन्हें निलंबित करने का आदेश दे सकता है। अदालत मेडा पर भारी हर्जाना लगा सकती है, जो सीधे दोषी अधिकारियों की जेब/सैलरी से वसूलने का आदेश दिया जा सकता है ताकि जनता के पैसे का दुरुपयोग न हो। कोर्ट मेडा को तुरंत मूल शर्तों पर आवंटी अनिल कुमार को जमीन का कब्जा सौंपने और रजिस्ट्री करने का अंतिम आदेश जारी कर सकता है।
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