नई दिल्ली। 8 अप्रैल को लागू किए गए युद्ध विराम को ना तो अमेरिका और ना ही ईरान मानने को तैयार है। घोषित युद्ध विराम के बावजूद दोनों ओर से ताबड़तोड़ हमले किए जा रहे हैं। दोनों ही देशों की आक्रामकता के चलते जो हालात बने हुए हैं उससे मिडिल ईस्ट में बड़ी लड़ाइ के आसार एक बार फिर से बन गए हैं। साथ ही इस बात की भी कम उम्मीद है अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता हो पाएगा या दोनों के वार्ताकार एक बार फिर से बातचीत की मेज तक आ सकेंगे। दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सामने शर्त रखी है कि शांति के लिए उसे अपना यूरेनियम स्टॉक या तो अमेरिका को सौंपना होगा या नष्ट करना होगा, जिसे ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया है। ईरान की शर्त है कि उसके बंदरगाहों की नाकाबंदी तत्काल खत्म की जाए। इसके लिए अभी अमेरिका तैयार नहीं नजर आ रहा है।
हमलों का सिलसिला
अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि उसने ईरानी सैन्य स्थलों पर हमला किया। गोरुक शहर और केशम द्वीप में ईरानी रडार और ड्रोन ठिकानों पर हमले किए। जबकि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने कहा कि उसने खाड़ी क्षेत्र में एक अमेरिकी अड्डे को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई की। स्ट्रेट होर्मूज पर ईरानी मिसाइलों का पहरा और ईरानी बंदरगाहों की अमेरिका द्वारा नाकाबंदी के चलते यह तनाव काफी बढ़ गया है। इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट ही नहीं दुनिया भर के देशों पर देखा जा रहा है। दुनिया के सभी देश चाहते हैं कि लड़ाई मुस्तकिल तौर पर खत्म हो, लेकिन अभी इसके मुस्तकिल तौर पर खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
समझौते में देरी के साइड इफैक्ट
ईरान और अमेरिका के बीच मुस्तकिल तौर पर जंग खत्म होने में हो रही देरी की वजह से पूरी दुनिया खासतौर से भारत पर ज्यादा साइड इफैक्ट पड़ रहा है। सबसे ज्यादा बुरा असर ईधन की तेजी से बढ़ रही कीमतों को लेकर पड़ रहा है। हालांकि जंग को लेकर दोनों मुल्कों के करीब आने की संभावनाओं के चलते दुनिया के कुछ मुल्कों में तेल के दाम सौ रुपए प्रति बैरल कम भी हुए हैं, लेकिन भारत जैसे देशों में तेल के दाम कम होने के बाद भी आम आदमी का इसका फायदा नहीं मिल रहा है। दुनिया के तमाम देश चाहते हैं कि जंग जल्द से जल्द खत्म हो और यह तभी संभव है जब दोनों देश किसी समझौते के लिए तैयार हों।
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