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CEO क्यों बने है ऑडिट में बाधा

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CEO क्यों बने है ऑडिट में बाधा
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मेरठ। कैंट बोर्ड के डोर टू डोर ठेके में ऐसा क्या है जो फाइल CDA की ऑडिटर टीम तक पहुंचने में बड़ी बाधा बनी हुई है। बोर्ड में इसको लेकर तमाम तरह की बातें सुनने में आ रही हैं। सबसे बड़ी बात तो यह कि ऐसा क्या है इस फाइल में जिसके चलते साहब को खुद चलकर CDA से मिलने जाना पड़ गया। जब इस फाइल में किसी भी प्रकार की irregularity नहीं है तो फिर हो जाने दो ऑडिट। जो लोग सवाल उठा रहे हैं ऑडिट के बाद खुद ही उनके मुंह बंद हो जाएंगे। यह तो मौका है ऐसे लोगों के मुंह बंद करने का जो डोर टू डोर ठेके को लेकर कैंट बोर्ड पर अरसे से सवाल उठाते रहे हैं। शिकायतें करते रहे हैं। ऐसे लोगों का मुंह बंद करने के लिए CDA की ऑडिट टीम को फाइल थमाने से बेहतर कोई दूसरा मौका हो ही नहीं सकता। चाहे केंद्र सरकार के हो या राज्य सरकार के हो ऑडिट प्रक्रिया एक आवश्य कार्रवाई है जिससे ना करना सरकार द्वारा प्रतिपादित कानून व कायदे का उल्लंघन है। यह कैंट बोर्ड पर भी उतना ही लागू होता है जितना कि बाकि महकमों पर CDA ऑडिट में फाइल न देना — क्या नियमों का उल्लंघन नहीं, निश्चित रूप से यह उल्लंघन की श्रेणी में आता है और इसके लिए कारण बताओ नोटिस भी थमाया जा सकता है। मेरठ छावनी परिषद में CDA ऑडिट के दौरान डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण ठेके की फाइल उपलब्ध न कराए जाने की खबरों ने मामला गंभीर बना दिया है।नियमों के अनुसार, ऑडिट के समय मांगे गए सभी अभिलेख उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है। ऐसे में फाइल न देना audit obstruction (ऑडिट में बाधा) माना जा सकता है।
बोर्ड लगातार दावा कर रहा है कि—CBI ने सभी आरोपों को “baseless” पाया है। इतना ही नहीं CBI जांच में कोई irregularity नहीं पायी गयी है। यदि वाकई ऐसा है तो फिर तो कोई दिक्कत होनी ही नहीं चाहिए। अगर सब कुछ सही है, तो ऑडिट से फाइल क्यों रोकी जा रही है।
इस तरह के मामलों में विधि विशेषज्ञों की स्पष्ट राय है। जिसमें वह बताते हैं कि ऑडिट टीम से फाइल छुपाना या देरी करना संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। इससे भी गंभीर यह वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता के नियमों का उल्लंघन की श्रेणी में आता है। और यदि भुगतान से जुड़ी फाइल हो, तो मामला और गंभीर हो जाता है
डोर टू डोर ठेके की जिस फाइल को लेकर इतना कुछ सुनने मे आ रहा है उसको लेकर यह भी सुना जा रहा है कि ₹1.5 करोड़ भुगतान पर सवाल उठ रहे हैं। जिस फाइल को लेकर विवाद है, वह—डोर-टू-डोर ठेके से जुड़े लगभग ₹1.5 करोड़ भुगतान से संबंधित बताई जा रही है, सुनने में तो यह भी आ रहा है कि क्या यह मान लिया जाए कि क्या भुगतान प्रक्रिया की जांच से बचने की कोशिश हो रही है? CBR vs Ground Reality। CBR No.127 में “No irregularity” का दावा, लेकिन ऑडिट में फाइल उपलब्ध नहीं। यह विरोधाभास खुद एक बड़ा प्रश्न बन गया है। मामला मिनिस्ट्री तक पहुंचाए जाने की बात भी सुनने में आ रही हैं उसका ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया गया बताया जाता है। मामले में यदि अब किसी भी स्तर से लीपापोती की जाती है तो यह मामला उच्च स्तर (DGDE / MoD / Vigilance) तक जा सकता है या कहें कि जाना तय माना जा रहा है। और यदि सचमुच (DGDE / MoD / Vigilance) तक गया तो फिर रायता समेटना दुश्वार हो जाएगा।

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