भारत समेत दुनिया भर के करीब दर्जन भर देश डिजिटल पीढ़ी व्यवस्था के खिलाफ लामबंद
नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर जनरेशन ज़ेड (Gen Z) यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए युवाओं का आक्रोश सड़कों पर लावा बनकर फूट रहा है। भारत, बंगलादेश, नेपाल, इटली, फ्रांस, अल्बानिया सरीखे करीब दर्जन से अधिक देशों में यह डिजिटल पीढ़ी व्यवस्था के खिलाफ लामबंद हो रही है। आलोचकों और समाजशास्त्रियों के अनुसार, यह गुस्सा केवल सरकारों की विफल नीतियों के प्रति नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आर्थिक असंतोष, परीक्षा प्रणालियों में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन जैसे कई बड़े अंतर्निहित कारण हैं। सरकार को इस असंतोष को राष्ट्रीय सुरक्षा या साजिश के चश्मे से देखने के बजाय, युवाओं के लिए रोजगार, निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और पारदर्शी लोकतांत्रिक संवाद स्थापित करने पर तत्काल ध्यान देना चाहिए।
परीक्षाओं में धांधली व पेपर लीक
भारत में इस युवा विद्रोह की शुरुआत मई-जून 2026 में NEET और अन्य राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली व पेपर लीक के बड़े घोटाले से हुई। इस परीक्षा विफलता के बाद जब युवाओं ने सवाल उठाए, तो एक प्रख्यात कानूनी मंच से कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘तिलचट्टों’ (Cockroaches) से कर दी गई। इसी अपमान को युवाओं ने अपना हथियार बना लिया और अभिजीत दिपके नामक युवा के नेतृत्व में एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक समूह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का जन्म हुआ। इस संगठन का नारा है: “उस जनता की पार्टी, जिसकी गिनती करना सिस्टम भूल गया।”
सफलता और दमन की दास्तान
जून से जुलाई 2026 तक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर भारी विरोध प्रदर्शन हुए। तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंन्द्र प्रधान को 25 जुलाई को इस्तीफा देना पड़ा और सरकार को ‘सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम’ (Public Examinations Act) पारित करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस आंदोलन को लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोमन वांगचुक की भूख हड़ताल से भी बड़ा समर्थन मिला। पिछले एक दशक में जो लोकतांत्रिक और नागरिक स्पेस सिकुड़ गया था, इन युवाओं ने बिना किसी बड़े राजनीतिक दल के बैसाखी के उसे दोबारा जिंदा कर दिया है। भारत में अब ‘जेन अल्फा’ (स्कूल जाने वाले बच्चे) भी बुनियादी ढांचे और शिक्षकों की कमी पर अधिकारियों से सीधे सवाल पूछ रहे हैं (जैसे अरुणाचल प्रदेश में छात्राओं का 65 किमी पैदल मार्च)।
सड़कों पर निकाल रहे गुस्सा
यह आंदोलन थमा नहीं है। हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा देश की मतदाता सूचियों से कथित तौर पर 13 करोड़ (130 मिलियन) नाम हटाए जाने (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन या SIR प्रक्रिया) के खिलाफ सीजेपी और अन्य युवा संगठन दिल्ली व मुंबई की सड़कों पर उतर आए हैं। युवाओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया से युवा और वैध मतदाताओं के संवैधानिक अधिकार छीने जा रहे हैं। दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय के कड़े दमन व बड़े पैमाने पर हिरासत में लिए जाने के बावजूद यह आंदोलन पूरे देश में फैल रहा है।
पूरी दुनिया में नाराज है युवा
इटली में युवा महंगाई और आवास संकट (Housing Crisis) के खिलाफ ‘इटालिया इन पियाज़ा’ आंदोलन चला रहे हैं। अल्बानिया में ‘फ्लेमिंगो आंदोलन’ के तहत छात्र सीधे प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। वहीं, मोरक्को (अफ्रीका) में खराब स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे की कमी को लेकर युवा सड़कों पर हैं।
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