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नसीराबाद में कार्रवाई तो फिर CBM में क्यों नहीं

नसीराबाद में कार्रवाई तो फिर CBM में क्यों नहीं

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नसीराबाद में कार्रवाई तो फिर CBM में क्यों नहीं
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आउटसोर्स कर्मचारियों के हितों से खिलवाड़ ही नहीं, CBM अफसरों ने तो ठेकेदार काे सिक्योरिटी राशि भी दी लौटा

नई दिल्ली/जयपुर/मेरठ। नसीराबाद छावनी परिषद के एक कर्मचारी ने परिषद के अस्थायी कर्मचारियों के पीएफऔर ईएसआईसी में गड़बड़ी करने का आरोप लगाते हुए पूर्व छावनी सीईओ और ठेकेदार फर्म के विरुद्ध मामला दर्ज कराए जाने के बाद यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या मेरठ कैंट बोर्ड में भी एक पूर्व सीईओ (ज्योति कुमार) व कुछ अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करायी जा सकती है। साथ ही यह भी कि जब नसीराबाद में आरोपों के चलते एक सीईओ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करायी गयी है तो फिर मेरठ में वैसा क्यों नहीं किया जा रहा है, जबकि जिस मामले को लेकर कैंट बोर्ड मेरठ के एक पूर्व सीईओ के खिलाफ एफआईआर की बात कही जा रही है उन पर तो सीबीआर की अनदेखी के गंभीर आरोप हैं, जिसके चलते आउटसोर्स कर्मचारियों को वित्तीय हानि पहुंची है और सीबीआर का उल्लंघन कर आउटसाेर्स कर्मचारियों को वित्तीय हानि पहुंचाने के साथ ही सरकारी खजाने को भी राजस्व का नुकसान पहुंचाने की बात कही जा रही है

नसीराबाद छावनी का मामला

नसीराबाद छावनी परिषद के एक कर्मचारी ने परिषद के अस्थायी कर्मचारियों के पीएफ और ईएसआईसी में गड़बड़ी करने का आरोप लगाते हुए पूर्व छावनी सीईओ और ठेकेदार फर्म के विरुद्ध मामला दर्ज कराया है। है। छावनी क्षेत्र के सिटी थाने में दर्ज कराए मामले में पीपाड़, जोधपुर हाल वरिष्ठ लिपिक छावनी परिषद शिवराम पुत्र रामनिवास ने आरोप लगाया कि वर्ष 2022-23 में तत्कालीनछावनी सीईओ उमेश पारीक ने मैसर्स शक्ति एंटरप्राइजेज,अहमदाबाद के पदाधिकारियोंके साथ मिलकर छावनी परिषद में 120 अस्थायीकर्मचारियों का मैन पावर सप्लाई का टेंडर दिलवाया और उसके बाद ठेकेदार फर्म के साथ मिलकर अस्थायी कर्मचारियों के पीएफ और ईएसआईसी की कटौती किए बिना ठेकेदार फर्म के मालिक को भुगतान कर अस्थायी कर्मचारियों को नुकसान पहुंचाया गया।वरिष्ठ लिपिक शिवराम ने ये भी आरोप लगाया कि तत्कालीन सीईओ पारीक द्वारा ठेकेदार फर्म द्वारा बीच में ही काम छोड़ देने पर उसकी सिक्योरिटी डिपॉजिट भी वापस लौटा दी और 120 अस्थायीकर्मचारियों को नुकसानपहुंचाया गया। सिटी थानापुलिस ने मामला दर्ज करजांच प्रारंभ कर दी।

मेरठ कैंट बोर्ड का मामला

मेरठ कैंट बोर्ड का मामला भी काफी हद तक नसीराबाद छाबनी से मिलता जुलता बताया जा रहा है। हुआ यूं कि वर्कफोर्स कंपनी कैंट बोर्ड को आउटसोर्स स्टाफ उपलब्ध कराती थी। नियम कायदों के इतर यानि खिलाफ जाकर ठेकेदार कंपनी ने जमा कराए जाने वाले अंशदान को आउटसोर्स कर्मचारियों की सेलरी से काटा। जुलाई 2023 में हुई कैंट बोर्ड की बैठक कि यदि बात करं तो CBR के नंबर 25 में साफ लिखा है कि
विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। बोर्ड ने पाया कि मैनपावर सप्लायर ठेकेदार, मेसर्स वर्क फोर्स सॉल्यूशन ने समझौते की धारा 25 और 29 का पालन नहीं किया है, जिसमें दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन देने की शर्त थी। क्षेत्रीय श्रम आयुक्त ने भी 04.07.2022 की अपनी आदेश शीट में इस बात का उल्लेख किया है और ठेकेदार तथा मुख्य नियोक्ता (प्रिंसिपल एम्प्लॉयर) दोनों को निर्देश दिया है कि वे दैनिक वेतन भोगियों को न्यूनतम वेतन का भुगतान करें। उन्होंने इस आदेश का पालन करने के लिए 15 दिन का समय दिया है। यदि इस अवधि में अनुपालन नहीं किया जाता है, तो बिना किसी और पत्राचार के कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। लेखाकार ने बोर्ड को सूचित किया कि दिसंबर 2021, जनवरी 2022 और फरवरी 2022 के महीनों के लिए ठेकेदार को न्यूनतम वेतन की राशि का भुगतान कर दिया गया था। हालाँकि, ठेकेदार ने प्रति व्यक्ति प्रति माह 2210 से 2300 रुपये की कटौती की है और कर्मचारियों को कम भुगतान किया है। इस संबंध में कार्यालय को कई शिकायतें मिली हैं, जिनमें स्टेशन मुख्यालय, मेरठ छावनी (मेरठ कैंट) से प्राप्त शिकायत भी शामिल है। पीसीबी (PCB) ने ठेकेदार की सेवा में कमी को रेखांकित किया। ‘मिलिट्री कंजरवेंसी एग्रीमेंट’ (सैन्य संरक्षण समझौता) के तहत, सेना क्षेत्र में 252 कर्मचारियों की आवश्यकता थी, लेकिन ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे कर्मचारियों की संख्या इससे 30 से 50 तक कम है। बोर्ड ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि ठेकेदार ने वैधानिक दायित्वों (statutory liability) के भुगतान के लिए बोर्ड द्वारा दी गई राशि को अपने पास रोक कर रखा है। लगभग 3 महीने की अवधि के लिए EPF और ESI। बोर्ड ने फरवरी 2021 में, दिसंबर 2021 के न्यूनतम वेतन के साथ-साथ इन वैधानिक देनदारियों को जमा करने के लिए ठेकेदार को भुगतान किया था। हालाँकि, ठेकेदार ने इन वैधानिक देनदारियों को मई 2022 में जमा किया, जिससे उसने समझौते की धारा 25 और 29 का उल्लंघन किया।

कानूनी राय का जिक्र

बोर्ड ने छावनी बोर्ड (कैंट बोर्ड) के स्थायी वकील की कानूनी राय को भी रिकॉर्ड में लिया। केस फाइल देखने के बाद, उन्होंने 11.07.2022 के अपने पत्र (बिना संख्या) में यह राय दी कि ठेकेदार ‘M/s वर्क फोर्स सॉल्यूशंस’ ने अनुबंध की सामान्य शर्तों और अतिरिक्त नियमों व शर्तों का उल्लंघन किया है। इसके अलावा, ठेकेदार ने 07.06.2022 के CBR संख्या 7 में बताए अनुसार शपथ पत्र (एफिडेविट) के रूप में कोई वचनबद्धता (अंडरटेकिंग) नहीं दी है, बल्कि वह गलत इरादे से मुख्य बातों को टाल रहा है। साथ ही, उक्त ठेकेदार ने 30.10.2021 के समझौते की धारा 25 और 29 का भी स्पष्ट उल्लंघन किया है। अनुबंध के पहले पक्ष (प्रथम पक्ष) ने दूसरे पक्ष को पर्याप्त अवसर दिया है। 04.05.2022 के CBR संख्या 3 के तहत, 05.05.2022 को एक ‘कारण बताओ नोटिस’ (शो कॉज नोटिस) दूसरे पक्ष ‘M/s वर्क फोर्स सॉल्यूशंस’ को दिया गया था। यह नोटिस 30.10.2021 के समझौते की धारा 27 के अनुसार दिया गया, जिसका उद्देश्य अनुबंध को समाप्त करना था। इसलिए, इस अनुबंध को समाप्त किया जा सकता है। प्रथम पक्ष, यानी छावनी बोर्ड, मेरठ, समझौते की धारा 25 और 29 के तहत कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, जिसमें अनुबंध को समाप्त करना और इस अनुबंध के लिए जमा की गई सुरक्षा राशि (सिक्योरिटी डिपॉजिट) को जब्त करना शामिल है। अतः, उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने के बाद और अनुबंध समझौते की धारा 25 व 29 के अनुपालन में, M/s वर्क फोर्स सॉल्यूशन के अनुबंध को समाप्त करने का निर्णय लिया गया। बोर्ड ने यह भी तय किया कि कम भुगतान की गई राशि की वसूली ठेकेदार द्वारा कैंट बोर्ड के पास बैंक गारंटी के रूप में जमा की गई 1 करोड़ रुपये की सुरक्षा राशि (सिक्योरिटी डिपॉजिट) से की जाएगी, और केवल बची हुई राशि ही वापस की जाएगी।

ऐसा नहीं किया

यहां चौंकाने वाली बात तो यह हे कि जुलाई 2023 की बोर्ड बैठक में जो प्रस्ताव पास किया गया और CBR में जिसका बाकायदा उल्लेख भी है उसका पालन नहीं किया गया। तत्कालीन कार्यदायी संस्था यानि ‘M/s वर्क फोर्स सॉल्यूशंस’ की एक करोड़ की राशि सिक्योरिटी मनी के रूप में कैंट बोर्ड के पास जमा थी। यह तय हुआ था कि कर्मचारियों की सेलरी से गलत तरीके से काट लिए गए 42 लाख की रकम को कार्यदायी संस्था यानि ‘M/s वर्क फोर्स सॉल्यूशंस’ की एक करोड़ की राशि सिक्योरिटी मनी से काट लिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और तत्कालीन सीईओ ज्याेति कुमार के कथित आदेश पर ठेकेदार को पूरे एक करोड़ की उसकी सिक्योरिटी राशि का भुगतान कर दिया गया। मेरठ कैंट बोर्ड का यह मामला काफी हद तक नसीराबाद छाबनी से मिलता जुलता है। इसलिए यह सवाल उठ रहा है कि नसीराबाद के सीईओ के खिलाफ जो कानूनी कार्रवाई की गयी है उसी तर्ज पर यहां भी वैसे ही कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
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