नई दिल्ली।भारत सरकार के दो आर्थिक सलाहकार सुरजीत भल्ला और अरविंद सुब्रह्मणयम जो कभी सरकार की आर्थिक नीतियों का बचाव करते थे आज पोल खोल रहे हैं और नेतृत्व बदले की सलाह दे रहे हैं। कभी मोदी सरकार की अर्थ नीतियों की देश और दुनिया में पैरवी करने वाले उनके आर्थिक सलाहकार रहे सुरजीत भल्ला व अरविंद सुब्रह्मणम भी अब मोदी सरकार की अर्थ नीतियों की कटू आलोचना कर रहे हैं। ये केवल सरकार के आर्थिकसलाहकार ही नहीं थी बल्कि वो देश की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी रहे हैं। उन्होंने कहा है कि भाजपा भले ही चुनाव जीत रही हो, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से हार रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि देश तेजी से साल 1991 के दौर की ओर जा रहा है। पिछले एक साल में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले लगभग 12 प्रतिशत कमज़ोर हुआ है। यह लगातार सातवां वर्ष है, जब रुपये में गिरावट दर्ज की गई और 2025 में यह एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा।
पीएम मोदी के आर्थिक सलाहकार रहे सुरजीत भल्ला कहते हैं कि देश की अर्थ व्यवस्था इस समय निचले स्तर पर है। उसको संभालने में भाजपा नीत सरकार का प्रदर्शन बेहद खरबा है। वो इससे भी और बड़े खतरे की ओर आगाह करते हुए कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मोदी सरकार इसचको संभाल पाएगी। भाजपा की आलोचन करते हुए पूर्व आर्थिक सलाहकार का मानना है कि भाजपा का मकसद केवल बंगाल चुनाव जीतना था और अब अगला टारगेट साल 2029 में लोकसभा चुनाव जीतना है। यूपी के विधानसभा की जहां तक बात है तो भाजपा जानती है कि कैसे हिन्दू मुसलमान कर वहां का चुनाव जीतना है। सरकार को यह तक नहीं पता कि जो आर्थिक संकट है उससे कैसे निपटना है इस पर मंथन के बजाए कांग्रेस व दूसरे दलों पर दोष मंढा जा रहा है।
हालात बेहद नाजुक
पूर्व आर्थिक सलाहकार का कहना है कि असली बात ‘बड़ी अर्थव्यवस्था’ और 35 साल के औसत से तुलना में छिपी है। 2014 से बीजेपी शासनकाल के दौरान जीडीपी वृद्धि दर के आधार पर भारत दुनिया में नौवें स्थान पर रहा है। प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि के मामले में भारत आठवें स्थान पर और अमेरिकी डॉलर में प्रति व्यक्ति आय वृद्धि के आधार पर 16वें स्थान पर।” हालांकि यह तुलना भाजपाइयों को पसंद नहीं आयी है।
अरविंद सुब्रमण्यम ने अपने लेख की शुरुआत में लिखा है अमेरिका के जाने-माने डिप्लोमैट और पॉलिटिकल साइंटिस्ट यूरोपीय यूनियन की सामूहिक निर्णय लेने की अक्षमता का मज़ाक उड़ाते हुए पूछा करते थे, संकट के समय आख़िर फोन किसे किया जाए? मोदी सरकार में 2014 से 2018 तक मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने भी सरकार की नीतियों की आलोचना की है।
अरविंद सुब्रह्मणम कहते है, ”आज जब रुपया लगातार गिर रहा है और भारत गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तो वैसी ही भावना यहां भी दिखाई देती है, “आख़िर ज़िम्मेदारी किसके हाथ में है? जो भी हैं, या नहीं हैं, उन्हें बदल देना चाहिए। नेतृत्व परिवर्तन की ज़रूरत इसलिए भी है क्योंकि संकट की स्थिति में जनता और बाज़ार दोनों को यह भरोसा चाहिए होता है कि कोई निर्णायक व्यक्ति है।” ”आज ज़रूरत ऐसे विश्वसनीय चेहरे की है जो साफ़ संदेश दे सके। जैसे यूरो संकट के दौरान इटली के पूर्व प्रधानमंत्री मारियो द्रागी ने कहा था, जो भी होगा, हम देख लेंगे। दिल्ली से ख़ामोशी और दिशाहीनता दोनों दिखाई देती है, जबकि मुंबई से ऐसा लगता है मानो घटनाएं नीति-निर्माताओं पर हावी हो चुकी हों। प्रधानमंत्री की ओर से किफ़ायती की अपील ने भी बाज़ार को आश्वस्त करने के बजाय चिंता बढ़ाने का काम किया।’
Leave a comment