नई दिल्ली। साल 2016 महीना था सितंबर का जब पीएम मोदी ने केंद्र शासित कश्मीर में कुछ दिन पहले हुए सशस्त्र लड़ाकों के हमले का जवाब दे रहे थे, जिसमें 18 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान के नेताओं को सुनना चाहिए: हमारे 18 सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।” लेकिन किन एक दशक बाद, पाकिस्तान अलग-थलग पड़ने से बहुत दूर है, यह चीन का एक करीबी रणनीतिक सहयोगी है, जहां पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस सप्ताह दौरा किया, और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका के एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में फिर से उभरा है।
ट्रंप की वाे शाही मेजवानी
पिछले एक साल में पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और शरीफ दोनों ने व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात की है। इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। ट्रंप ने पाकिस्तानी नेतृत्व की अक्सर प्रशंसा भी की है। ट्रंप का वो बयान जिसमें उन्होंने कहा था कि वो दिन दूर नहीं जब भारत पाकिस्तान से तेल खरीदेगा। इसके अलावा भी भारत को लेकर ट्रंप के तमाम बयानों को केवल पाकिस्तान को खुश करने के तौर पर देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि कि पाकिस्तान की बढ़ती राजनयिक प्रतिष्ठा मोदी प्रशासन की गलतियों को उजागर करती है। जानकार यहां तक कहते हैं कि ट्रंप भारत को अपमानित करने और पाकिस्तान को खुश करने का कोई मौका अपने हाथ से नहीं जाने देता खासतौर से भारत को नरक बताने वाला बयान।
रूस और चीन की नजदीकियां
पड़ौसी मुल्क चीन की भारत से अदावत किसी से छिपी नहीं है। अब सिर्फ इतना हुआ है कि चीन ने भारत से दुश्मनी को तरीका बदल लिया है। जानकारों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ समय में चीन एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है। इस बात को अमेरिका और रूस ने स्वीकार किया है। ट्रंप और पुतिन के बीजिंग दौरे के कुछ ऐसे ही निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। इतना ही नहीं जो ट्रंप भारत को नरक बताते हैं ताइबान के सवाल पर चीन उस ट्रंप को भी धमकाने से बाज नहीं आता। रूस की चीन से नजदीकियां कभी भी भारत के हित में नहीं हो सकतीं।
अब वो बात कहां
ये तमाम घटनाएं भारतीय की विदेश नीति को संभालने वालों की काबलियत पर सवाल खड़े कर रही हैं। खासतौर से मिडिल ईस्ट में तनाव के बाद और उससे पहले भारत का अमेरिका से तेल खरीदना जबकि ईरान और रूस से सस्ता तेल मिलने के रास्ते खुले हुए है, उसके बाद भी अमेरिका के सामने याचक के रूप में पेश आना कमजोर विदेश नीति का मुजाहरा करता है। यह सवाल पूछा जाता है कि क्यों नहीं अमेरिका से आंखों में आंखें डालकर बातें की जाती जैसा कि श्रीमती इंदिरा गांधी तत्कालीन पीएम ने साल 1970 के दौरान बात की थी जब अमेरिका ने हिंद महासभागर में पाकिस्तान की मदद को सातवां बेडा भेजने की धमकी दी थी तो श्रीमती इंदिरा गांधी ने धमकाते हुए कहा था कि सातवां नहीं सत्तरवां बेड़ा भेजा और निक्सन को चुप करा दिया। इराक में अमेरिका के दखल के दौरान जब तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह न्यूयार्क गए थे तो एक कार्यक्रम में मीडिया ने उनसे सवाल किया कि इराक में यूएस को किस प्रकार से वह देखते हैं तो उन्होंने बगैर डरे कहा अमेरिका को इराक में दखल नहीं देना चाहिए था। तब की विदेश नीति और आज की विदेश नीति में अंतर आ गया है। आज याचक की स्थिति अधिक नजर आती है।
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