इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे के बाद तथाकथित नेशनल मीडिया को देश की बड़ी आबादी कर रही है बुरी तरह ट्रोल, “असली पत्रकारिता बनाम बिकाऊ मीडिया” की बहस
नई दिल्ली। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया खोजी रिपोर्ट (Express Investigation) ने देश के राजनीतिक और मीडिया गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। अखबार की रेजिडेंट एडिटर रितिका चोपड़ा द्वारा की गई इस पड़ताल के बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर मुख्यधारा के अन्य टीवी चैनलों व समाचार माध्यमों (जिन्हें अक्सर ‘नेशनल मीडिया’ कहा जाता है) की भूमिका और उनकी पत्रकारिता के स्तर पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों का मानना है कि इतने बड़े और संवेदनशील मुद्दे (जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से जुड़ा है) को कई बड़े नेशनल चैनलों ने शुरुआत में पर्याप्त जगह नहीं दी या दबाने का प्रयास किया। सोशल मीडिया पर यूज़र्स का कहना है कि जब एक प्रिंट अखबार इतनी बड़ी खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) कर सकता है, तो करोड़ों के बजट वाले टीवी चैनल सिर्फ राजनीतिक नोक-झोंक और टीआरपी (TRP) केंद्रित बहसों में क्यों उलझे रहते हैं। इसी कारण कई लोग इसे “असली पत्रकारिता बनाम बिकाऊ मीडिया” की बहस के रूप में देख रहे हैं। सितंबर 2026 में आबू रोड (राजस्थान) में आयोजित
राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन में स्वयं मीडिया घरानों के दिग्गजों ने स्वीकार किया कि टीवी चैनलों द्वारा
“ब्रेकिंग न्यूज़” और एल्गोरिदम/टीआरपी (TRP) के पीछे अंधी दौड़ ने पत्रकारिता की ईमानदारी और जनता के भरोसे को न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है।
भारतीय मीडिया अंतिम पायदान
‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) द्वारा जारी नवीनतम
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 (विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक) में भारतीय मीडिया
180 देशों की सूची में 157वें पायदान पर है. भारत की मीडिया स्वतंत्रता को इस सूचकांक में “बेहद गंभीर” (Very Serious) श्रेणी में रखा गया है। मीडिया की आजादी के मामले में
नॉर्वे दुनिया में पहले स्थान पर बना हुआ है. इसके बाद डेनमार्क और स्वीडन जैसे देश आते हैं। इस साख संकट के कारण देश की जनता, खासकर युवा पीढ़ी, अब मुख्यधारा के टीवी चैनलों को छोड़कर
स्वतंत्र डिजिटल मीडिया, प्रिंट अखबारों और यूट्यूब (YouTube) व पॉडकास्ट जैसे स्वतंत्र पत्रकारों के प्लेटफॉर्म की तरफ तेज़ी से मुड़ रही है, जहां वे सीधी और तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग देख पा रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों की रैंकिंग पर एक नज़र:
- साल 2026: 157वां स्थान (180 देशों में से)
- साल 2025: 151वां स्थान
- साल 2024: 159वां स्थान
- साल 2014: 140वां स्थान
खतरे में गोदी मीडिया की साख
जब डिजिटल मीडिया और गिने-चुने प्रिंट अखबार (जैसे द इंडियन एक्सप्रेस) ऐसी बड़ी खबरें लाते हैं, तो टीवी चैनलों पर भी अपनी गिरती साख को बचाने का नैतिक दबाव बनता है।जनता अब केवल शोर-शराबे वाली बहसों से ऊब रही है और तथ्यों पर आधारित खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) की मांग कर रही है। यदि नेशनल मीडिया को प्रासंगिक (Relevant) बने रहना है, तो उसे अपनी सामग्री (Content) के स्तर को सुधारना ही होगा।
काॅरपोरेट समूह का कब्जा
मुख्यधारा के कई बड़े मीडिया घरानों पर राजनीतिक हितों या बड़े कॉरपोरेट समूहों का नियंत्रण है। ऐसे में सत्ता या व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली खबरों को प्राथमिकता देना उनके व्यावसायिक हितों के खिलाफ जाता है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ का यह खुलासा यह साबित करता है कि भारतीय पत्रकारिता में अभी भी निष्पक्षता और साहस जिंदा है।
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