तिब्बत के लांगटांग लिरुंग पर्वत में चट्टान का एक बड़ा हिस्सा ढह गया, उसके ऊपर जमा ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आया जिससे बाढ़ आयी
नई दिल्ली। नेपाल में आयी बाढ़ के बाद अब चारों ओर तवाही ही तवाही नजर आ रही है। इस बाढ़ ने नेपाल की जीडीपी को बुरी तरह से हिला दिया है। जान और माल का भारी नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई करना नेपाल के लिए बेहद मुश्किल भरा नजर आ रहा है। दुनिया के देशों की मदद के बगैर जल्दी भरपाई मुश्किल दिखाई देती है। विनाशकारी बाढ़ की वजह इतनी जल्दी तय नहीं की जा सकती है लेकिन वैज्ञानिकों ने कहा कि आपदा से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिलता है कि तिब्बत के क़रीब लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तर में चट्टान का एक बड़ा हिस्सा ढह गया, जिससे उसके ऊपर जमा ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आ गया। गिरती हुई चट्टानों और बर्फ़ के करोड़ों क्यूबिक मीटर के मलबे की ताक़त को शुरुआत में भूकंप समझ लिया गया था। कुछ अनुमानों के मुताबिक़, इसने इतनी ऊर्जा पैदा की कि ग्लेशियर की बर्फ़ पिघल गई और चट्टानों, कीचड़, पानी की एक विशाल दीवार भोटेकोशी घाटी से होते हुए दर्जनों मील तक नेपाल में नीचे की ओर बह गई।
भारत के लिए कितना बड़ा खतरा
नेपाल से निकलने वाली गंडक (नारायणी), कोसी, और त्रिशुली जैसी प्रमुख नदियाँ सीधे भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रवेश करती हैं। यह आपदा केवल पानी का बहाव नहीं है, बल्कि अपने साथ करोड़ों टन पत्थर, कीचड़ और मलबा लेकर आई है, जिससे नदियों के तल ऊंचे हो रहे हैं और तटबंधों पर अत्यधिक दबाव बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे ट्रांस-बाउंड्री (सीमा पार) नदियों में अचानक प्रलयकारी बाढ़ का खतरा स्थाई रूप से बन गया है।
यूपी के कई जिलों में हाईअलर्ट
उत्तर प्रदेश के महराजगंज और कुशीनगर तथा बिहार के कई संवेदनशील जिलों में प्रशासन को हाई अलर्ट पर रखा गया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए गंडक बैराज और अन्य जल संरचनाओं से पानी के नियंत्रित डिस्चार्ज की निगरानी की जा रही है। संकट की इस घड़ी में भारत ने बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए नेपाल को चिकित्सा दलों, रेस्क्यू एक्सपर्ट्स और 65 टन से अधिक राहत सामग्री की त्वरित सहायता पहुंचाई है।
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