मथुरा और वृंदावन श्रद्धालुओं से खचाखच भर, देश ही नहीं दुनिया भर से श्रद्धालु पहुंचे, सभी आश्रम व होटल धर्मशाला फुल
नई दिल्ली/मथुरा। 4 सितंबर को मध्य रात्रि 12:00 बजे भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा, जिसमें मंदिरों में विशेष अभिषेक, श्रृंगार और महाआरती होगी। श्रीधाम वृंदावन और मथुरा समेत पूरे ब्रज मंडल में श्रीकृष्ण जन्माष्टी का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस मौके पर मथुरा के ज्ञानवापी मस्जिस के आसपास सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। वहीं दूसरी ओर केवल देश ही नहीं दुनिया भर से श्रद्धालु मथुरा वृंदावन पहुंच रहे हैं। वृंदावन में सारे होटल व धर्मशाला और आश्रम फुल हो गए हैं। कमोवेश यही स्थिति मथुरा और ब्रजमंडल के दूसरे तीर्थ स्थलों की भी है। कान्हा की नगरी मथुरा और वृंदावन को दुल्हन की तरह सजाया गया है। प्रमुख चौराहे, रास्ते और मंदिर रंग-बिरंगी विद्युत लाइटों व फूलों से जगमगा रहे हैं। जन्माष्टमी के अगले दिन यानी 5 सितंबर को पूरे ब्रजमंडल में ‘नंदोत्सव’ की धूम रहेगी। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मथुरा-वृंदावन आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए जिला व पुलिस प्रशासन ने व्यापक यातायात व्यवस्था और रूट डायवर्जन प्लान लागू किया है। यह व्यवस्था 5 सितंबर सुबह तक लागू रहेगी।
इस तिथि को जन्मे थे कृष्ण
धार्मिक मान्यताओं और आधुनिक खगोलीय गणनाओं (Computer Astrology) के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 18 जुलाई या फिर 21 जुलाई 3228 ईसा पूर्व हुआ। शास्त्रों और हिंदू पंचांग के अनुसार उनके जन्म का सटीक समय की यदि बात की जाए तो रात्री रात के 12:00 बजे (निशीथ काल), 3228 ईसा पूर्व (आज से लगभग 5253 वर्ष पहले)। हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि।
कृष्ण के जन्म के समय ग्रहों की दशा
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति को ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक ग्रंथों (जैसे श्रीमद्भागवत पुराण) में अत्यंत शुभ और अद्वितीय बताया गया है। उनके जन्म के समय रोहिणी नक्षत्र और हर्षन योग का अद्भुत संयोग था। भगवान का जन्म वृषभ लग्न और वृषभ राशि में हुआ था। उस समय चंद्रमा वृषभ राशि में उच्च के होकर गोचर कर रहे थे। आत्मा और तेज के कारक सूर्य देव उस समय सिंह राशि में अपनी स्वयं की राशि में मजबूत स्थिति में विराजमान थे। कर्मफल दाता शनि देव तुला राशि में थे, जो उनकी उच्च राशि है। ज्ञान और धर्म के देवता देवगुरु बृहस्पति कर्क राशि में थे, जो उनकी उच्च राशि मानी जाती है। शौर्य और ऊर्जा के प्रतीक मंगल देव मकर राशि में थे, जो उनकी उच्च राशि है। बुद्धि के कारक बुध देव कन्या राशि में अपनी उच्च राशि में स्थित थे। कला और सौंदर्य के देव शुक्र सिक्सथ (छठे) या अपनी मित्र राशियों में शुभ प्रभाव दे रहे थे। इस प्रकार, कृष्ण जन्म के समय पांच प्रमुख ग्रह (चंद्रमा, शनि, गुरु, मंगल और बुध) अपनी उच्च स्थिति में या स्वराशि में थे। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से ऐसी ग्रह स्थिति सदियों में किसी महापुरुष या साक्षात ईश्वर के अवतार के समय ही निर्मित होती है, जो उन्हें अदम्य आकर्षण, अद्वितीय शक्ति और लोक कल्याणकारी गुण प्रदान करती है।
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