पश्चिम उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बेंच के लिए केंद्रीय संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल का कानून मंत्री को ज्ञापन
मेरठ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश (वेस्ट यूपी) में हाईकोर्ट बेंच की मांग लगभग 70 साल पुरानी है, जो वर्ष 1951-1955 के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के कार्यकाल में पहली बार उठी थी। प्रयागराज (इलाहाबाद) हाईकोर्ट की दूरी इस क्षेत्र से 700 से 800 किलोमीटर होने के कारण वादकारियों को भारी आर्थिक और शारीरिक परेशानी उठानी पड़ती है। बेंच की मांग को सत्तर साल होने को आए वेस्ट के वकील और दूसरे लोग खासतौर कर रालोद सरीखे राजनीतिक दल जो अलग राज्य की मांग भी अपनी सुविधा के अनुसार उठाते रहे हैं, मिलकर भी वेस्ट को बेंच नहीं दिला सके। अब जबकि जयंत चौधरी केंद्र सरकार में मंत्री हैं लेकिन रालोदियों ने अब अलग राज्य और बेंच के मुद्दे से लगता है कि किनारा ही कर लिया।
कानून मंत्री से मुलाकात
केंद्रीय संघर्ष समिति ने नई दिल्ली में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को बेंच के लिए ज्ञापन दिया। साल 2027 में होने जा रहे यूपी विधानसभा के चुनाव से पहले वेस्ट यूपी में हाईकोर्ट बेंच के लिए सरकार पर प्रेशर बनाएंगे। इसी क्रम में केंद्रीय संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को ज्ञापन देकर पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने की मांग रखी। प्रतिनिधिमंडल में मेरठ बार के पूर्व अध्यक्ष गजेंद्र सिंह धामा, महेंद्रपाल शर्मा, अशोक शर्मा, संजय शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता नैपाल सिंह सोम और अब्दुल जब्बार खां शामिल रहे। मंत्री ने पश्चिमी यूपी को जल्द हाईकोर्ट बेंच का भरोसा दिलाया। हालांकि कुछ सीनियर एडवोकेट इसको केवल सरकार और संघर्ष समिति की ओर से रस्म अदायगी मान रहे हैं। वहीं दूसरी ओर संघर्ष समिति के पदाधिकारियों के मुताबिक, मंत्री ने कहा कि मुकदमों के बढ़ते दबाव को देखते हुए सरकार बेंच की स्थापना को लेकर गंभीर है। इस मुद्दे पर हर हफ्ते बैठकें हो रही हैं। वहीं, विधानसभा चुनाव से पहले बेंच आंदोलन को सोशल मीडिया के जरिए और तेज करने की तैयारी है। iश्चिमी उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति के चेयरमैन अनुज शर्मा और संयोजक परवेज आलम ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री के सामने बेंच की मांग रखी और ज्ञापन सौंपा। अनुज शर्मा और परवेज आलम ने कहा कि प्रदेश में जल्द विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार पर पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना के लिए दबाव बनाने का यह सही समय है। उन्होंने बताया कि बेंच की मांग को लेकर आंदोलन को अब इंटरनेट मीडिया पर भी चलाया जाएगा। संघर्ष समिति अगले हफ्ते से फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब समेत सभी प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अभियान शुरू करेगी। इसके लिए सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर की मदद ली जाएगी।अभियान के तहत पश्चिमी यूपी के 22 जिलों के अलग-अलग वर्गों के लोगों की बात सोशल मीडिया पेजों पर रखी जाएगी। समिति का उद्देश्य आम लोगों के जरिए हाईकोर्ट बेंच की मांग को मजबूती से उठाना है।
इसलिए नहीं मिलती बेंच
लखनऊ और दिल्ली में कई सरकारें आयीं और चली गयीं। यहां तक कि अलग राज्य की पैरवी करने वाले रालोदिए भी सरकार में रहे। इस वक्त खुद जयंत चौधरी कैबिनेट मंत्री हैं, लेकिन बेंच का कोई जिक्र नहीं। इसकी वजह की यदि बात करें तो आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से वकीलों और बार एसोसिएशनों ने किया। यह आंदोलन आम जनता और वादकारियों से उस स्तर पर नहीं जुड़ पाया कि यह एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले सके।
चुनाव से पहले आती है याद
पश्चिमी यूपी के राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर कभी भी एक मंच पर पूरी दृढ़ता से एकजुट नहीं हुए। चुनावों के समय बड़े वादे तो किए गए, लेकिन सत्ता में आने के बाद किसी भी दल ने संसद या विधानसभा में इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए। पश्चिमी यूपी के कई जिले (जैसे मेरठ, आगरा, मुरादाबाद, गाजियाबाद, अलीगढ़ आदि) बेंच को अपने यहाँ स्थापित कराना चाहते हैं। किस शहर में बेंच बने, इस पर पश्चिमी यूपी के वकीलों और नेताओं के बीच आम सहमति का अभाव रहा है, जिसका फायदा सरकारें उठाती रही हैं।
पूर्वांचल के वकीलों का विराेध
इलाहाबाद (प्रयागराज) हाईकोर्ट से जुड़े अधिवक्ताओं और पूर्वी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक-कानूनी हलकों का कड़ा विरोध। खंडपीठ बनने से मुकदमों और अधिकार क्षेत्र के बंटवारे की आशंका के चलते वहाँ का मजबूत लॉबी तंत्र हमेशा से इसका विरोध करता रहा है।
जसवंत आयोग का गठन
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति जसवंत सिंह की अध्यक्षता में इस तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया था। आयोग का मुख्य उद्देश्य यह समीक्षा करना था कि देश में कहाँ-कहाँ नई हाईकोर्ट बेंचों की आवश्यकता है और विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों की इस मांग का क्या तार्किक आधार है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की मांग के इतिहास में जसवंत सिंह आयोग की रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी दस्तावेज मानी जाती है। आयोग ने तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश की विशाल आबादी और भौगोलिक दूरी को देखते हुए अधिकतम तीन नई हाईकोर्ट बेंच/सर्किट बेंच स्थापित करने की मजबूत सिफारिश की थी। आयोग ने स्पष्ट रूप से माना कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वादकारियों को प्रयागराज जाने में अत्यधिक दूरी तय करनी पड़ती है। इसके समाधान के लिए उन्होंने आगरा में एक स्थायी हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने की सिफारिश की थी। उत्तराखंड (जो उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा था) के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों के नागरिकों के लिए नैनीताल और देहरादून में दो सर्किट बेंच स्थापित करने की सिफारिश की गई थी।
फसाद की जड़
आयोग द्वारा आगरा में स्थायी बेंच की स्पष्ट सिफारिश किए जाने के बावजूद, इसे उत्तर प्रदेश में कभी लागू नहीं किया गया। इसका मुख्य कारण क्षेत्रीय राजनीति, प्रयागराज के वकीलों का कड़ा विरोध और पश्चिमी यूपी के विभिन्न शहरों (जैसे मेरठ बनाम आगरा) के बीच आपसी खींचतान रही। बाद में साल 2000 में उत्तर प्रदेश का विभाजन हो गया और नैनीताल में उत्तराखंड का अपना अलग हाईकोर्ट बन गया, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश आज भी बिना किसी बेंच या सर्किट बेंच के अपनी पुरानी स्थिति में ही खड़ा है।
Leave a comment