व्यापार बंधु की बैठकों में उठायी जाने वाली समस्याओं को लेकर अफसरों में गंभीरता का अभाव, कागजी आख्या लगाकर प्रकरणों किया जाता निस्तारित
मेरठ। शासन के निर्देश पर व्यापारियों की समस्याओं के समाधान के लिए होने वाली व्यापार बंधु बैठकों को अफसरों ने ही मजाक बनाकर रख दिया है। हालात यह है कि जो समस्याएं उठायी जाती हैं उनमें से तमाम में कागजी आख्या लगाकर उनको निस्तारित दिखा दिया जाता है। इतना ही नहीं बैठक से सक्षम अधिकारी और कर्मचारी की अनुपस्थित रहने से समस्याओं की सूरत सीरत भी बदलती रहती है। अब तो हालात यह हो गयी है कि तमाम ऐसी समस्याएं हैं जिन्हें बाद में कार्यसूची से हटाकर उन्हें समाप्त मान लिया जाता है।
सीएम योगी से शिकायत
उद्योग बंधु की बैठकों में अफसरों के इसी रवैये से परेशान हाेकर अब सीएम योगी और मंडलायुक्त से शिकायत की गयी है। यह शिकायत उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल जनपद मेरठ के महामंत्री विनोद त्यागी ने की है। यहां यह भी बता दें कि इस संगठन में जिलाध्यक्ष विष्णु दत्त पराशर, राजकुमार मदान, महामंत्री अकरम गाजी सरीखे शहर के बड़े व्यापारी नेता भी शुमार हैं। सीएम योगी को भेजे पत्र में विनोद त्यागी ने उद्योग बंधु बैठकों के नाम पर अफसरों पर खानापूर्ति करने का आरोप लगाया है। उन्होंने सीएम योगी से मांग की है कि उद्योग बंधु की बैठकों को मात्र औपचारिकता बनने से रोका जाए। अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही निर्धारित करने अथवा निष्प्रभावी व्यवस्था को समाप्त की जाए।
अफसरों की कागजी आख्या से निस्तारित
सीएम योगी को भेजी गई चिट्ठी से तो यही लगता है कि उद्योग बंधु की बैठकों की स्थिति को अफसरों ने बेहद गंभीर अवस्था में पहुंचा दिया है। सीएम योगी को बताया गया है कि उद्योग बंधु की बैठकों को लेकर शासन की मंशा अत्यंत सराहनीय है, किंतु जनपद स्तर पर इन बैठकों का संचालन अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक चुका है। वास्तविक स्थिति यह है मासिक रूप से अध्यक्षता भी बदलती रहती है इसलिए आदेशों की दिशा और दशा भी बदलती रहती है। व्यापारियों द्वारा बैठकों में उठाए गए अधिक प्रकरणों का संबंधित विभाग द्वारा न तो समयबद्ध निस्तारण किया जाता है और न ही गुणवत्तापूर्ण समाधान प्रस्तुत किया जाता है। अनेक मामलों में बिना स्थल निरीक्षण, किये बिना तथ्यात्मक जांच एवं बिना समस्या का वास्तविक समाधान किए, कागजी आख्या लगाकर प्रकरणों को निस्तारित दर्शा दिया जाता है। कई मामलों में वर्षों तक प्रकरण लंबित रखे जाते हैं वादी गणों को लाभ दिया जाता है क्योंकि मासिक में सक्षम अधिकारी और कर्मचारी की अनुपस्थित रहने से सूरत सीरत भी बदलती रहती है और बाद में कार्यसूची से हटाकर उन्हें समाप्त मान लिया जाता है।
परिणामस्वरूप शहरों में अवैध कब्जे अतिक्रमण, जलभराव, गंदगी, जाम, अवैध निर्माण, फुटपाथों पर कब्जे तथा अन्य नागरिक समस्याएं लगातार बनी रहती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि संबंधित सक्षम अधिकारियों एवं कर्मचारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही निर्धारित न होने के कारण शासन की योजनाएं शून्य धरातल पर प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पा रही हैं। बैठक के बिन्दुओं का फॉलोअप तक नहीं लिया जाता। तमाम ऐसे विभाग है जिनकी पत्राचार के बाद आख्या भी प्रस्तुत नहीं की जाती। कुछ बिंदु इतने संसिटिव होते हैं जो जान माल से जुड़े होते हैं। जिनका सिविकसेंस विवेक के आधार पर तुरंत निर्णय लेकर कार्रवाई करके निस्तारण किया जाए बिंदुओं पर भी प्रशासन टाल मटोल करता है।
जवाबदेही की जाए तय
सीएम से आग्रह किया गया है कि यदि किसी बैठक में लिए गए निर्णय का निर्धारित समय सीमा में पालन नहीं होता, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध भी उत्तरदायित्व तय होना चाहिए। जब त जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक व्यापार बंधु की बैठकें केवल औपचारिक कार्यवाही बनकर रह जाएंगी और उन पर खर्च होने वाला सरकारी समय, धन एवं प्रशासनिक संसाधन व्यर्थ जाते रहेंगे। सीएम से आग्रह किया गया है कि व्यापार बंधु की प्रत्येक बैठक में लिए गए निर्णयों के अनुपालन हेतु संबंधित अधिकारियों उपस्थिति भी नहीं रहते जिनको व्यक्तिगत जवाबदेही निर्धारित की जाए। प्रत्येक प्रकरण का स्थल निरीक्षण, फोटो, वीडियो एवं अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर ही निस्तारण स्वीकार किया जाए। भ्रामक, असत्य झूठ बोलना पाप तो है लेकिन कोई अपराध नहीं अथवा बिना कार्य किए झुठी निस्तारण रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारी के विरुद्ध विभागीय एवं विधिक कार्रवाई की जाए। प्रत्येक लंबित प्रकरण की समयबद्ध समीक्षा कर विलंब के लिए उत्तरदायी अधिकारियों का उत्तरदायित्व तय किया जाए। यदि शासन इन बैठकों को प्रभावी, जवाबदेह एवं परिणामोन्मुख नहीं बना सकता, क्योंकि सक्षम अधिकारी उपस्थित नहीं रहते तो केवल औपचारिकता निभाने के लिए ऐसी बैठकों का आयोजन बंद करने अथवा उनकी कार्यप्रणाली का पूर्ण पुनर्गठन करने पर निर्णय लिया जाए, ताकि सरकारी धन, समय एवंसंसाधनों का अनावश्यक अपव्यय न हो।
सीएम योगी से पत्र में आग्रह किया गया है कि शासन की मंशा के अनुरूप इस व्यवस्था को वास्तव में प्रभावी बनाया जाए। यदि सक्षम अधिकारी केवल कागजी कार्यवाही करके बैठकों उपस्थित न ही ना रहे तो जनता की समस्याएं यथावत बनी रहेंगी, तो ऐसी व्यवस्था पर जनता का विश्वास समाप्त होना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सुशासन की स्थापना के लिए उत्तरदायी अधिकारियों की जवाबदेही तय करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस प्रकरण में उच्चस्तरीय जांच कराकर आवश्यक शासनादेश जारी करने तथा दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
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