New Delhi. भारत में दूध की मिलावट (यूरिया, डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा) और कम गुणवत्ता एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बन चुकी है, भारत में दूध की मिलावट (यूरिया, डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा) और कम गुणवत्ता एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बन चुकी है। उत्तर भारत में 47% तक नमूने फेल हो रहे हैं। यह मिलावटी दूध कैंसर, गुर्दे की खराबी, यकृत के नुकसान और पेट की बीमारियों का कारण बन रहा है। संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में मिलावट और बैक्टीरिया का उच्च स्तर चिंताजनक है।
प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान
संस्थापक,
Cyclomed Fit India
दूध को भारत में परंपरागत रूप से पोषण का एक प्रमुख आधार माना गया है, जो ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के दैनिक आहार में गहराई से समाहित है। तथापि, पिछले तीन दशकों में एक चिंताजनक विरोधाभास सामने आया है—जहाँ कई क्षेत्रों में दूध उत्पादक पशुओं की संख्या में कमी आई है, वहीं दूध एवं दुग्ध उत्पादों की उपलब्धता और उपभोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह असंतुलन उपभोग किए जा रहे दूध की प्रामाणिकता, सुरक्षा एवं दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
आपूर्ति–मांग का असंतुलन
ग्रामीण भारत में, विशेषकर उत्तरी राज्यों के अनेक क्षेत्रों में, देशी गायों एवं भैंसों की संख्या में क्रमिक गिरावट देखी गई है। शहरीकरण, कृषि का यंत्रीकरण, चारे की बढ़ती लागत तथा पारंपरिक दुग्ध व्यवसाय की घटती लाभप्रदता जैसे कारण इस गिरावट के प्रमुख कारक रहे हैं। इसके बावजूद, बाजार में दूध एवं दुग्ध उत्पादों की भरमार है—खुले दूध से लेकर पैकेज्ड डेयरी उत्पादों तक। प्राकृतिक उत्पादन में कमी के बावजूद दिखाई देने वाली यह अधिकता, मांग–आपूर्ति के अंतर को पूरा करने में कृत्रिम अथवा मिलावटी दूध की बढ़ती भूमिका की ओर संकेत करती है।कृत्रिम दूध एवं मिलावट की प्रवृत्तियाँ
कृत्रिम दूध सामान्यतः, डिटर्जेंट, यूरिया, रिफाइंड तेल, स्टार्च तथा अन्य रसायनों के उपयोग से तैयार किया जाता है, जिससे प्राकृतिक दूध के भौतिक एवं रासायनिक गुणों की नकल की जाती है। इसी प्रकार पनीर, खोया एवं मिठाइयों जैसे दुग्ध उत्पाद भी निम्न गुणवत्ता अथवा कृत्रिम अवयवों से बनाए जाने की प्रवृत्ति देखी जाती है। यद्यपि इन प्रक्रियाओं से उत्पादन और लाभ में वृद्धि हो सकती है, परंतु ये खाद्य सुरक्षा एवं जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं।स्वास्थ्य पर प्रभाव
चिकित्सकीय अवलोकनों के अनुसार, चयापचय (metabolic) एवं अंग-विशिष्ट रोगों में वृद्धि देखी जा रही है। यद्यपि इनका कारण बहु-कारकीय है, फिर भी खाद्य पदार्थों, विशेषकर दूध में मिलावट से दीर्घकालिक संपर्क निम्न समस्याओं में योगदान कर सकता है:- गुर्दे की कार्यक्षमता में कमी (यूरिया एवं भारी धातुओं के कारण)
- यकृत पर तनाव एवं लिवर विकार
- जठरांत्र संबंधी समस्याएँ
- दीर्घकालिक विषाक्त प्रभाव एवं चयापचय असंतुलन
नियामक चुनौतियाँ
खाद्य सुरक्षा प्रवर्तन की भूमिका जनविश्वास एवं स्वास्थ्य मानकों को बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। तथापि, इसके प्रभावी क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ विद्यमान हैं:- नमूनाकरण (sampling) की अपर्याप्तता एवं अनियमितता
- प्रयोगशाला परीक्षणों एवं कानूनी प्रक्रियाओं में विलंब
- पाए गए उल्लंघनों पर सीमित अनुवर्ती कार्रवाई
- संसाधनों की कमी एवं प्रशासनिक अक्षमताएँ
सुझाव एवं समाधान
इस बढ़ती समस्या के समाधान हेतु बहुआयामी रणनीति आवश्यक है:- *डेयरी ढांचे का सुदृढ़ीकरण
- देशी पशु पालन को प्रोत्साहन
- किसानों को सब्सिडी एवं पशु चिकित्सा सेवाएँ
- *खाद्य सुरक्षा प्रवर्तन को मजबूत करना
- नियमित एवं आकस्मिक नमूनाकरण
- अपराधियों के लिए त्वरित कानूनी प्रक्रिया
- *प्रमाणित आपूर्ति श्रृंखला को बढ़ावा
- परीक्षणित एवं प्रमाणित दूध का उपयोग
- सहकारी डेयरी मॉडल का विस्तार
- *जनस्वास्थ्य अभियान
- मिलावट पहचानने की जागरूकता
- सुरक्षित उपभोग की शिक्षा
- *अनुसंधान एवं निगरानी
- रोग प्रवृत्तियों और खाद्य मिलावट के बीच संबंध पर अध्ययन
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