सर्किट हाउस में बैठक के उपरांत सीधे जा पहुंचे उल्देपुर जांच के लिए
मेरठ। सुप्रीमकोर्ट द्वारा गठित न्यायिक आयोग के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त जस्टिस सुधांशु धूलिया अवैध निर्माणों की जांच को मेरठ पहुंचे। उनके जांच के दायरे में मुख्यत: उल्देपुर का इलाका रहेगा। जस्टिस धूलिया के पहुंचने के बाद अवैध कालोनियां काटने वाले बिल्डर और उनके मददगार अफसर सांसद में हैं। न्यायालय के आदेश पर गठित इस आयोग के आने से अवैध प्रॉपर्टी डीलरों, अवैध कॉलोनाइजरों और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों में हड़कंप मच गया है। मेरठ पहुंचने के बाद जस्टिस सुधांशु धूलिया और नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव पी. गुरु प्रसाद ने सर्किट हाउस में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक में मंडलायुक्त भानु चंद्र गोस्वामी, जिलाधिकारी डॉ. वीके सिंह, एसएसपी बीबीजीटीएस मूर्ति और मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के उपाध्यक्ष संजय कुमार मीणा मौजूद रहे। बताया जाता है कि बैठक में सवाल किया गया कि मेरठ विकास प्राधिकरण पिछले 5 वर्षों से अधिक समय तक इस भारी अवैध निर्माण पर चुप क्यों बैठा रहा। क्या इन अवैध आवासीय कॉलोनियों को बसाने में मेडा के अधिकारियों की कोई साठगांठ या भ्रष्टाचार शामिल था। अवैध निर्माण को बढ़ावा देने या मूकदर्शक बने रहने वाले दोषी अधिकारियों को चिह्नित करना ताकि उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सके।
काफिले के साथ पहुंचे उल्देपुर
बैठक के तुरंत बाद आयोग की टीम उल्डेपुर क्षेत्र में जमीनी हकीकत देखने पहुंची। जस्टिस धूलिया ने मौके पर बने प्रॉपर्टी डीलरों के दफ्तरों और वहां खड़ी गाड़ियों को देखकर अधिकारियों से तीखे सवाल किए। उन्होंने अधिकारियों से पूछा कि बिना स्वीकृत ले-आउट प्लान (तलपट मानचित्र) के इतनी बड़ी संख्या में कॉलोनियां कैसे खड़ी हो गईं और अब तक मेडा (MDA) ने इन पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले की जांच के लिए मुख्य रूप से 5 बिंदु तय किए हैं। यह पता लगाना कि उल्डेपुर में जिस जमीन पर कॉलोनियां बनी हैं, वह सरकारी है या निजी। किसानों यानि मूल भूस्वामियों और खरीदारों के बीच किस तरह से जमीनों की अवैध खरीद-फरोख्त हुई। मेरठ विकास प्राधिकरण पिछले 5 वर्षों से अधिक समय तक इस भारी अवैध निर्माण पर चुप क्यों बैठा रहा। क्या इन अवैध आवासीय कॉलोनियों को बसाने में मेडा के अधिकारियों की कोई साठगांठ या भ्रष्टाचार शामिल था। अवैध निर्माण को बढ़ावा देने या मूकदर्शक बने रहने वाले दोषी अधिकारियों को चिह्नित करना ताकि उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सके।
अकेले ए जोन में ही 16 हजार से ज्यादा
यह पूरी कवायद सुप्रीम कोर्ट द्वारा 21 सितंबर 2026 को दिए गए एक ऐतिहासिक और सख्त आदेश के तहत की जा रही है। कोर्ट मेरठ के रिहायशी इलाकों में चल रही अवैध व्यावसायिक गतिविधियों और बिना नक्शे के बने ढांचों को लेकर बेहद सख्त है। मेडा के ज़ोन-A में कुल 16,726 अवैध और अनधिकृत निर्माणों की पहचान की गई है, जिन्हें खाली कराकर सील करने और बाद में ध्वस्त करने का आदेश है। पहले से ही सील की गई 44 संपत्तियों में से 20 से अधिक को ढहाया जा चुका है और बची हुई अवैध इमारतों पर भी प्रतिदिन कार्रवाई के निर्देश हैं।
सख्त सुप्रीम संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि “समय बीत जाने से अवैधता खत्म नहीं हो जाती”। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि किसी अवैध इमारत के गिरने से जान-माल का नुकसान होता है, तो संबंधित सरकारी अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। न्यायिक आयोग अपनी विस्तृत जांच पूरी कर दिसंबर 2026 में होने वाली अगली सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। इस रिपोर्ट के आधार पर मेरठ में कई बड़े बिल्डरों और मेडा के दोषी अधिकारियों पर बड़ी कानूनी गाज गिरना तय माना जा रहा है।
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