वेस्ट में हाईकोर्ट बैंच की मांग कर सकती है बड़ा डेमेज
वेस्ट में हाईकोर्ट बैंच की मांग कर सकती है बड़ा डेमेज
0
Share
Share
वकीलों का आक्रोश भाजपा (BJP) के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है
मेरठ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश (वेस्ट यूपी) में लंबे समय से लंबित हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर वकीलों का आक्रोश भाजपा (BJP) के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है, जिससे आगामी चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान (डैमेज) पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति और के अनुसार, वेस्ट यूपी के 22 जिलों के अधिवक्ताओं ने “बेंच नहीं तो वोट नहीं” का नारा बुलंद करते हुए सत्ताधारी दल के पूर्ण बहिष्कार का ऐलान किया है। प्र जाट नेता व उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व सचिव चौधरी यशपाल सिंह का कहना है कि वेस्ट यूपी में बैंच के सवाल को अब भाजपा टालने की स्थिति में नहीं। यह मांग करीब सत्तर साल पुरानी है। इसमें जितना भी काम हुआ है वो केवल कांग्रेस के शासनकाल में हुआ है। भाजपा का रवैया बैंच विरोधी साफ नजर आता है।
सीएम योगी के रवैये से नाराजगी
वकीलों के एक प्रतिनिधिमंडल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर बेंच स्थापना की मांग की थी। वकीलों के अनुसार, मुख्यमंत्री ने इस मांग को सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र बताते हुए कहा कि राज्य सरकार इसमें सीधे तौर पर कुछ नहीं कर सकती, जिससे वकील असहमत और नाराज हो गए। सीएम योगी पिछले दिनों सुभारती में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आए हुए थे।
लाहौर पास इलाहाबाद दूर
किलोमीटर की बात यदि की जाए तो पाकिस्तान का लाहौर इतनी दूर नहीं जितना की इलाहाबाद या कहें प्रयागराज है। सहारनपुर, मेरठ और आसपास के जिलों से प्रयागराज (इलाहाबाद) हाईकोर्ट की दूरी 700 से 800 किलोमीटर है। इससे आम जनता और व्यापारियों को न्याय पाने के लिए भारी समय और पैसा खर्च करना पड़ता है। वेस्ट यूपी में हाईकोर्ट बेंच की मांग पिछले सात दशकों से चल रही है। वकीलों का आरोप है कि चुनाव के दौरान हर बार वादा किया जाता है, लेकिन बाद में इस मुद्दे को टाल दिया जाता है।
विधानसभा चुनाव में 22 जिलों पर असर
यह आंदोलन सिर्फ किसी एक शहर तक सीमित नहीं है। मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, अलीगढ़ और रामपुर सहित वेस्ट यूपी के 22 जिलों के वकील एकजुट हैं। वकीलों का समाज में अच्छा प्रभाव होता है, जिससे वे एक बड़े जनमत को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। बार एसोसिएशनों ने कचहरी परिसरों के गेट पर बैनर लगाकर भाजपा सांसदों, विधायकों और पदाधिकारियों के प्रवेश पर रोक लगा दी है। वकीलों ने फैसला किया है कि वे MP-MLA कोर्ट में भाजपा नेताओं के मुकदमों की पैरवी नहीं करेंगे और अपने पुराने वकालतनामे भी वापस ले रहे हैं। वकीलों ने भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी का भी वकालतनामा वापस लेने का निर्णय लिया था, लेकिन डा. वाजपेयी ने डेमेज कंट्रोल कर लिया है। कीलों के इस आंदोलन को स्थानीय व्यापारिक और सामाजिक संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है। चूंकि मुकदमों का सामना करने वाले अधिकांश लोग व्यापारी या किसान होते हैं, इसलिए यह वर्ग भी वकीलों की इस मांग के साथ सहानुभूति रख रहा है।
वेस्ट में भाजपा की चिंता
वकीलों द्वारा भाजपा नेताओं के न्यायिक और सामाजिक स्तर पर किए जा रहे इस कड़े बहिष्कार ने पार्टी के स्थानीय रणनीतिकारों की चिंता बढ़ा दी है। यदि भाजपा नेतृत्व या राज्य सरकार की ओर से इस मुद्दे पर जल्द ही कोई सकारात्मक या मध्यस्थता वाली पहल नहीं की जाती, तो वेस्ट यूपी के 22 जिलों में पार्टी को बड़ा राजनीतिक और चुनावी डैमेज उठाना पड़ सकता है।
Leave a comment