भारतीय सेना की पश्चिमी कमान के तहत एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील रणनीतिक मिलिट्री स्टेशन
मेरठ। सुरक्षा कारणों के चलते मेरठ कैंट के कुछ नागरिक क्षेत्रों के नगर निगम में विलय होने में देरी हो रही है। देश की 62 छावनियों में मेरठ छावनी की गिनती टॉफ फाइव में होती है। देश की राजधानी नई दिल्ली के करीब होने और कुछ भौगोलिक व सामाजिक जटिलताओं के चलते मेरठ कैंट के नगर निगम क्षेत्र में प्रस्तावित विलय में देरी हो रही है। दरअसल मेरठ कैंट भारतीय सेना की पश्चिमी कमान के तहत एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील रणनीतिक मिलिट्री स्टेशन है। सिविल लाइनों और सैन्य प्रतिष्ठानों के आपस में जुड़े होने के कारण, पूरी तरह से सुरक्षा घेरा तैयार किए बिना आनन-फानन में सिविल एरिया को अलग करने से सेना के सुरक्षा प्रोटोकॉल प्रभावित होने का खतरा है। यही वजह है कि सेना के अधिकारी हर कदम बेहद फूंक-फूंक कर रख रहे हैं।
चुनौतियां अपार
नाम ना छापे जाने की शर्त पर सेना के एक रिटायर्ड कर्नल ने इस मुद्दे पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भले ही रक्षा मंत्रालय ने सैद्धांतिक रूप से देश भर के कैंट बोर्डों के सिविल क्षेत्रों को अलग करने का फैसला कर लिया है और 10 छावनियों को डी-नोटीफाई भी किया जा चुका है, लेकिन मेरठ कैंट के मामले में इस भौगोलिक बदलाव में कई प्रशासनिक, कानूनी और वित्तीय अड़चनों के कारण देरी हो रही है। रिटायर्ड कर्नल बताते हैं कि इसमें भारी चुनौतियों की बात कही जा रही है। मेरठ कैंट में बड़ी संख्या में संपत्तियां औपनिवेशिक काल के ‘ओल्ड ग्रांट’ और लंबी अवधि की लीज पर आधारित हैं। इन संपत्तियों का मालिकाना हक मूल रूप से रक्षा मंत्रालय के पास है। इन जमीनों का मालिकाना हक नागरिकों को सौंपते हुए राज्य सरकार और नगर निगम को कैसे ट्रांसफर किया जाए, इस पर अब तक पूरी विधिक सहमति नहीं बन पाई है। रक्षा मंत्रालय बिना किसी शुल्क के एसेट्स देना चाहता है, लेकिन उनके वर्गीकरण को लेकर तकनीकी पेंच फंसा हुआ है। इसके अलावा कैंट बोर्ड के सैकड़ों संविदात्मक और नियमित कर्मचारियों की पेंशन और वेतन की जिम्मेदारी कौन उठाएगा, यह अभी भी एक बड़ा और अनसुलझा व सबसे बड़ा सवाल है।
नगर निगम भी नहीं तैयार
जानकारों की मानें तो नगर निगम पहले से ही शहर के बड़े हिस्से की नागरिक सुविधाएं संभालने में वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। कैंट बोर्ड के अंतर्गत आने वाले बड़े नागरिक क्षेत्र (जैसे सदर बाजार, आबूलेन, लालकुर्ती, रजबन) के विलय के बाद वहां की सड़कों, नालियों, स्ट्रीट लाइट और सफाई व्यवस्था का वित्तीय बोझ नगर निगम पर आ जाएगा।
रिपोर्ट का इंतजार
विलय की रूपरेखा तय करने के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकार (उत्तर प्रदेश शासन) और स्थानीय सैन्य अधिकारियों को मिलाकर एक त्रिपक्षीय समिति का गठन किया गया था। इस समिति द्वारा संपत्तियों, एसेट्स और देनदारियों का विस्तृत सर्वे करने और अंतिम रिपोर्ट सौंपने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं बतायी जा रही है। इसकी वजह मेरठ शहर और कैंट की सीमाओं से सटे इलाकों की भौगोलिक स्थिति है। इसके अलावा कैंट बोर्ड के अधीन चलने वाले स्कूल, अस्पताल और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स (जैसे सार्वजनिक बाजार) का प्रबंधन सीधे नगर निगम या राज्य के संबंधित विभागों को दिया जाना है। इन सेवाओं के सुचारू संचालन और प्रशासनिक नियंत्रण के ट्रांसफर की नियमावली अभी पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी है।
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