18वें ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने के लिए नई दिल्ली पहुंच रहे हैं ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन, नाम लिए बगैर पहले भी अमेरिका दे चुका है धमकी
नई दिल्ली। 12 व 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स सम्मेलन का हिस्सा बनने के लिए नई दिल्ली पहुंच रहे ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की त्यौरियां ना चढ़ी हो ऐसा हो नहीं सकता। उस पर तुर्रा ये कि इस सम्मेलन में अमेरिका को टक्कर देने वाले रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीन पुतिन भी नई दिल्ली पहुंच रहे हैं। अमेरिका ईरान की मौजूदगी को प्रतिबंधों को तोड़ने और वैश्विक मंच पर रूस-चीन के साथ मिलकर अमेरिकी नेतृत्व वाले वैश्विक ढांचे को चुनौती देने के एक बड़े ‘रणनीतिक दांव’ (BRICS Bet) के रूप में देख रहा है। इनके अलावा दूसरे देशों की यदि बात की जाए तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग (एक बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ आगमन)। यहां यह जरूर याद रखा जाना जरूरी है कि ईरान से रूस और चीनी की नजदीकिया जगजाहिर हैं, लेकिन यह बात अमेरिका को पंसद नहीं। इन देशों के अलावा नई दिल्ली में जिन अन्य देशों के प्रमुख पहुंचने की बात कही जा रही है उनमें साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा, मिश्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, (UAE) से एक शीर्ष नेतृत्व व प्रतिनिधिमंडल, इथोपिया और ब्राजील के नेता और राष्ट्राध्यक्ष के अलावा बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट तोकायेव जैसे भागीदार देशों के नेता भी इस कूटनीतिक बैठक का हिस्सा बन रहे हैं।
अमेरिका के लिए परेशान करने वाला
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (सितंबर 2026) में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की मौजूदगी और उनके कूटनीतिक कदमों पर
अमेरिका (Washington) कड़ी नजर रख रहा है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य, विशेषकर खाड़ी क्षेत्र में जारी हालिया संघर्षों के बीच ईरान की इस सक्रियता के अमेरिका के लिए परेशानी तय मानी जा रही है। ईरान ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर एक ऐसे वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम और द्विपक्षीय व्यापार तंत्र की मांग कर रहा है, जो अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी बैंकिंग प्रणाली पर निर्भर न हो।
भारत को धमकी
हाल ही में जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति की द्विपक्षीय मुलाकात हुई, तो अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन/मार्को रुबियो और अमेरिकी प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए देशों को चेतावनी दी है कि जो भी तेहरान (ईरान) को राजस्व जुटाने या प्रतिबंधों से बचने में मदद करेगा, वह खुद अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ सकता है। ईरान लगातार मांग कर रहा है कि ब्रिक्स देश साझा घोषणापत्र (Leaders’ Declaration) में अमेरिकी और इजरायली सैन्य कार्रवाइयों की स्पष्ट निंदा करें। हालांकि, भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे अमेरिका के मित्र देश ब्रिक्स के भीतर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यूएई जैसी ताकतें इस पर आम सहमति बनने से रोक रही हैं, जिससे ब्रिक्स के भीतर भी वैचारिक मतभेद उभर रहे हैं।
अमेरिका को चुनौती
ईरान का मानना है कि ब्रिक्स के जरिए वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को अलग-थलग (Isolate) होने से बचा सकता है और उसे कूटनीतिक वैधता (Political Legitimacy) मिलती है। अमेरिका के लिए इसका मतलब यह है कि चीन और रूस समर्थित इस विस्तारित ब्रिक्स ब्लॉक में ईरान शामिल होकर ग्लोबल साउथ के देशों के बीच अमेरिकी वैश्विक आधिपत्य को सीधी चुनौती पेश कर रहा है।
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