जयंत की भाजपा से नजदीकि मुसलमानों से दूरी में तब्दील
जयंत की भाजपा से नजदीकि मुसलमानों से दूरी में तब्दील
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बुल्डोजर एक्शन और धार्मिक संवेदनशीलताओं के पैमाने पर मुस्लिम वोटों का रालोद-भाजपा गठबंधन में ट्रांसफर होना बेहद मुश्किल
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विशेषकर पश्चिमी यूपी में मस्जिदों और मजारों पर कानूनी या अवैध अतिक्रमण विरोधी कार्रवाइयों (बुल्डोजर एक्शन) के बाद, मुस्लिम मतदाताओं के बीच जयंत चौधरी (RLD) और भाजपा के गठबंधन को लेकर नाराजगी और दूरी बेहद गहरी हो गई है। पारंपरिक रूप से जाट-मुस्लिम एकता (जो 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद किसान आंदोलन के जरिए फिर से कायम हुई थी) रालोद की सबसे बड़ी ताकत रही है, लेकिन भाजपा के साथ जाने से इस समीकरण को भारी नुकसान पहुंचा है। धार्मिक स्थलों पर बुल्डोजर चलने, वक्फ बोर्ड कानूनों में संशोधनों और ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण मुस्लिम समाज सीधे तौर पर भाजपा की नीतियों के खिलाफ खड़ा है। चूंकि जयंत चौधरी वर्तमान में केंद्र की भाजपा सरकार में केंद्रीय मंत्री बने हुए हैं। मुस्लिम मतदाताओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्हें इन कार्रवाइयों में मूक भागीदार या ‘सहयोगी’ के रूप में देख रहा है। इस वजह से मुस्लिम समाज के बीच उनकी स्वीकार्यता न के बराबर रह गई है। इससे रालोद के रणनीतिकार भी अंजान नहीं है। माना जा रहा है कि इसी के चलते मुसलमानों पर अब निर्भरता के बजाए जयंत चौधरी ने भी जाट, ब्राह्मण, त्यागी और गुर्जर जैसी अन्य जातियों को साधने और एक नया राजनीतिक समीकरण (सोशल इंजीनियरिंग) तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया है।
महसूस कर रहे ठगा
वेस्ट यूपी के इंटलेक्चुल माने जाने वाले कई मुस्लिमों ने नाम ना छापे जाने की शर्त पर इस मुद्दे पर खुलकर बातचीत की। उन्होंने बताया कि साल 2022 का चुनाव में जब रालोद और समाजवादी पार्टी (सपा) का गठबंधन था, तब वेस्ट यूपी के मुसलमानों ने एक तरफा बवोट देकर रालोद तमाम के कई जाट और मुस्लिम उम्मीदवारों को जिताया था। जयंत चौधरी के पाला बदलने के बाद मुस्लिम मतदाताओं को लगा कि उनके वोटों का इस्तेमाल भाजपा को सत्ता में लाने के लिए किया गया। समुदाय के भीतर इसे एक ‘राजनीतिक विश्वासघात’ के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस के करीब
मुस्लिम विद्धानों का खासकर उनका जिनकी मुलसमानों में स्वीकार्यता है, उनका मानना है कि साल 2027 के विधानसभा चुनाव में रालोद से मुस्लिम आधार छिटकने का सीधा फायदा अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन (I.N.D.I.A) को मिल रहा है। मुस्लिम मतदाता अब पूरी तरह से सपा-कांग्रेस के पाले में लामबंद हो रहे हैं, क्योंकि वे इन दलों को भाजपा और उसकी नीतियों के खिलाफ एकमात्र मजबूत विकल्प मानते हैं।
डेमेज कंट्रोल का प्रयास
मुस्लिम समुदाय की इस नाराजगी को भांपते हुए जयंत चौधरी और रालोद के शीर्ष नेता लगातार मुस्लिम-दलितों-अति पिछड़ों के सम्मेलन पर उतारू हैं। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि बुल्डोजर एक्शन और धार्मिक संवेदनशीलताओं के रहते बड़े पैमाने पर मुस्लिम वोटों का रालोद-भाजपा गठबंधन में ट्रांसफर होना बेहद मुश्किल है। मस्जिद-मजारों और बुल्डोजर से जुड़े भावनात्मक और धार्मिक मुद्दों के बाद पश्चिमी यूपी का आम मुस्लिम मतदाता जयंत चौधरी के भाजपा के साथ रहने को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। आगामी चुनावों में रालोद को मुख्य रूप से केवल जाट, गुर्जर और भाजपा के पारंपरिक हिंदू वोट बैंक पर ही निर्भर रहना होगा।
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