नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी महिला के गर्भ में पहले से बच्चा हो और बाद में उसकी शादी किसी अन्य व्यक्ति से हो जाती है, तो विवाह के दौरान जन्म लेने वाले बच्चे को वैध माना जाएगा … हालांकि अनेक हिन्दू संगठनों ने सुप्रीम फैसले पर नुकताचीनी की है। उनका मानना है कि इस प्रकर के फैसले समाज में व्याभिचार का माहौल बनाएंगे और पति के प्रति पत्नी की इमानदारी की भावना को भी कमजोर करेंगे। लेकिन सुप्रीम फैसले में जो कुछ कहा गया है अदालत पर उस अडिग है और बताया गया है कि यह फैसला नया नहीं है। देश में इस प्रकार का कानून बहुत पुराना है और प्रचलित है। वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि यह तो वही मिसाल हो गयी कि होटल में लजीज खाना खाए कोई और बिल भरे कोई दूसरा। कानून के तहत, यदि बच्चा शादी के दौरान या विवाह टूटने के 280 दिनों के भीतर पैदा होता है, तो उसे पति की ही वैध संतान माना जाता है। जैविक पिता कोई और होने पर भी, कानूनी जिम्मेदारी और पिता का दर्जा उसी व्यक्ति का होता है। डीएनए टेस्ट जैसे कदम अदालतें बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में उठाती हैं, ताकि बच्चे के अधिकारों और सामाजिक स्थिति की सुरक्षा की जा सके।
इस फैसले ने शादीशुदा जोड़ों के बीच बच्चे के पितृत्व निर्धारण के कानूनी पहलुओं पर तीखी बहस छेड़ दी है. एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी विवाहित महिला का बच्चा होता है, तो उसके पति को ही कानूनी तौर पर उस बच्चे का पिता माना जाएगा। चाहे बच्चे का असली पिता कोई भी हो, उस पति को अपनी पत्नी के बच्चे की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। यह फैसला भारतीय कानून की एक विशिष्ट धारा, खासकर भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 पर आधारित है।
सुप्रीम फैसला
किसी भी महिला का शादी के बाद बच्चा पैदा होता है, तो कानून यह मान लिया जाएगा कि पति ही बच्चे का कानूनी पिता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार के मामलों में भी, जब तक पति यह साबित नहीं कर देता कि गर्भाधान के समय वह अपनी पत्नी के साथ नहीं था. तब तक कानूनी रूप से वही बच्चे का पिता होगा. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीएनए परीक्षण की मांग किसी भी पक्ष का खुद अधिकार नहीं है और इसे एक नियमित प्रक्रिया के रूप में नहीं किया जाना चाहिए. बच्चे का कल्याण, व्यक्तिगत गोपनीयता और सामाजिक गरिमा को जैविक तथ्यों से ऊपर रखा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 के अनुसार, यदि किसी वैध विवाह के दौरान कोई बच्चा पैदा होता है, तो यह माना जाता है कि वह विवाहित दंपत्ति की संतान है। पितृत्व की इस धारणा को तभी नकारा जा सकता है, जब यह साबित हो जाए कि दंपत्ति उस समय साथ नहीं रह रहे थे और उनके बीच शारीरिक संबंध स्थापित करना संभव नहीं था।
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