महिला पत्रकारों से मारपीट की घटना को लेकर तमाम प्रेस संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया, आरोपी पुलिस वालों पर कार्रवाई संभव
नई दिल्ली। दिल्ली के साकेत में दो मुस्लिम महिला पत्रकारों (शाहीन खान और नफीसा खान) के साथ हुई कथित मारपीट और दुर्व्यवहार का मामला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए राजनीतिक और छवि के मोर्चे पर काफी परेशानी और दबाव बढ़ाने वाला साबित हो रहा है। हालांकि दिल्ली पुलिस (जो केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है) ने इन आरोपों को “भ्रामक और निराधार” बताते हुए खारिज किया है और इसे सिर्फ ‘गलत पार्किंग व वीवीआईपी रूट बाधित करने’ का मामला बताया है, लेकिन इस घटना से उपजे विवाद ने भाजपा को कई तरफ से घेर लिया है।दावा किया जा रहा है कि यह घटना साकेत में एक निजी अस्पताल के उद्घाटन के दौरान हुई, जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता मौजूद थीं। ‘बेटी बचाओ’ और महिला सुरक्षा का नारा देने वाली भाजपा के लिए एक महिला मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में ही महिला पत्रकारों के साथ ऐसी कथित बर्बरता होना रक्षात्मक स्थिति पैदा करता है।
सांप्रदायिक आधार पर पीटा
पीड़ित पत्रकारों का आरोप है कि उन्हें मुख्यमंत्री से सवाल पूछने की कोशिश करने पर हिरासत में लिया गया और थाने में पीटा गया। पत्रकारों ने यह भी आरोप लगाया है कि साकेत थाने में जब पुलिसकर्मियों को उनकी धार्मिक पहचान (मुस्लिम होने) का पता चला, तो उनके साथ मारपीट और गाली-गलौज बढ़ गई। विपक्षी दल और नागरिक समाज इस मुद्दे को लेकर भाजपा सरकार की ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ छवि को आक्रामक तरीके से हवा दे रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि प्रभावित होती है।
बैकफुट पर भाजपा
आम आदमी पार्टी (AAP), कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। AAP नेताओं ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और दिल्ली पुलिस पर तीखे हमले बोलते हुए इसे “प्रेस की आजादी को दबाने का हिंसक प्रयास” करार दिया है। चूंकि दिल्ली में कानून-व्यवस्था सीधे केंद्र (भाजपा सरकार) के अधीन है, इसलिए इसका सीधा राजनीतिक नुकसान भाजपा को उठाना पड़ रहा है।
मीडिया संगठन एकजुट
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स (IWPC) और दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स जैसे बड़े पत्रकार संगठनों ने इसकी कड़े शब्दों में निंदा की है। साकेत थाने के बाहर वकीलों, छात्रों (AISA) और सामाजिक कार्यकर्ताओं का लगातार धरना प्रदर्शन और FIR दर्ज करने की मांग, इस मुद्दे को सोशल मीडिया पर लगातार ट्रेंड में बनाए हुए है, जिससे सरकार पर चौतरफा दबाव है। इस मामले में यदि पुलिस के खिलाफ निष्पक्ष जांच या किसी तरह की विभागीय कार्रवाई नहीं होती है, तो यह मुद्दा आने वाले दिनों में भाजपा की ‘प्रशासनिक जवाबदेही’ और ‘प्रेस स्वतंत्रता’ की साख को और अधिक नुकसान पहुंचा सकता है।
पुलिस वालों पर कार्रवाई संभव
मोदी सरकार (केंद्रीय गृह मंत्रालय) साकेत पुलिस के खिलाफ निश्चित रूप से सीधी और सख्त कार्रवाई कर सकती है क्योंकि दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर राज्य सरकार के नहीं, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के अधीन आती है। यद्यपि वर्तमान में दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को “तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक” बताया है, लेकिन यदि सरकार राजनीतिक दबाव, मानवाधिकार संगठनों या कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई करने का मन बनाती है, तो वह प्रशासनिक और कानूनी कदम उठा सकती है।
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