मेरठ। आवास विकास का बुलडोजर मकानों पर कहर बनकर टूट रहा है। जिस मकानों को नोटिस दिए गए हैं उनके सैटबैक छोड़ने के नाम पर आज तीसरे दिन साेमवार को भी आवास विकास परिषद अफसर जेसीबी लेकर मौके पर पहुंचे और जहां से बीते रविवार छुट्टी वाले दिन काम रोका था वहां से तोड़फोड़ का सिलसिला शुरू कर दिया। बीते दो दिनों के मुकाबले आज तीसरे दिन जेसीबी काफी तेजी से गरज रही थीं। ऐसा नजर आता था मनो मियाद तय कर दी गयी है और तय मियाद में सारे मकानों को तोड़ना है। लेकिन जेसीबी के गरजने की आवाज जिनके मकान तोड़े जा रहे थे उन पर आफत की मानिंद गुजर रही थीं। सोमवार की सुबह सुबह से ही आवास विकास के अधिकारी पुलिस बल के साथ क्षेत्र में पहुंचे और चिन्हित संपत्तियों पर कार्रवाई शुरू कर दी। अभियान के दौरान कई स्थानों पर अतिक्रमण हटाया गया। वहीं दूसरी ओर जिनके आशियानों पर जेसीबी गरज रही थीं वो इस विधानसभा से अपने नुमाइंदे और खासतौरसे भाजपा को चुनाव में सबक सिखाने की बात कहकर दिल की भड़ास निकाल रहे थे।
अपने आशियानों को यूं टूटता देखकर लोगों से रहा नहीं गया और मौके पर मौजूद अफसरों पर उनका गम और गुस्सा गुबार बनकर फूट पड़ा लेकिन जब उनका विरोध तेज हुआ तो वहां मौजूद वर्दी धारियों ने कानून के डंडे और जेल की सलाखों का खौफ दिखाकर चुप करा दिया। लोग चुपचाप अपने आशियानों की बर्बादी का तमाश देखते रहे। इस दौरान कई बार ऐसे मौके पर जब लोगों के सब्र का बांध टूट गया। उनकी अधिकारियों से तीखी बहस भी हुई। कुछ कहना था कि पैसे लेकर पहले खुद ही बनवाते हैं और अब तोड़ने जा आते हैं। ऐसा कब तक चलेगा।
जो बहस कर रहे थे उनसे अधिकारियों का कहना था कि जहां कार्रवाई की जा रही है उन्हें पूरा मौका दिया गया। कई दिन पहले नोटिस दिए गए ताकि वो खुद ही सैटबैक के लिए तोड़फोड़ कर लें जब नहीं की तो आवास विकास को सुप्रीमकोर्ट के आदेशों के अनुपालन में कार्रवाई करनी पड़ रही है। हालांकि भारी पुलिस बल की मौजूदगी के चलते अभियान बिना किसी बाधा के जारी रहा। आवास विकास की टीम बार-बार एक ही बात कह रही थी कि नोटिस दिए थे खुद ही तोड़ लेते तो अच्छा था नुकसान कम होता, लेकिन लोग धरने और प्रदर्शन करते रहे। यह नहीं सोचा कि सुप्रीमकोर्ट का मामला है कोई मदद नहीं करेगा। स्वयं सेटबैक खाली करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था।
आशियानों को बचाने का था तरीका उस पर चला कोई न्हीं
जो आशियाने आज गिराए जा रहे हैं उन्हें बचाने का तरीका भी था और वो तरीका कारगर भी था लेकिन यह बात अलग है कि कोई उस पर चला ही नहीं। ना तो वो जिनके आशियाने थे और ना ही वो नेता जो दम भर थे कि इन मकानों की ईट भी नहीं छूने दी जाएगी। लेकिन ईट तो ईंट अब पूरा आशियना ही बर्बाद हो गया। नाम न छापे जाने की शर्त पर आवास विकास परिषद के उच्च पदस्थ एक अफसर ने बताया कि होना यह था कि सालों पहले जब सैटबैक को लेकर नोटिस दिए गए थे तो उन नोटिसों को लेकर बजाए नेताओं और कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने के बजाए लोगों को वक्त जाया किए बगैर आवास विकास के दफ्तर में आकर संबंधित लिपिक से मिलकर आशियाना बचाने का तरीका मसलन कंपाउंडिंग का तरीका पूछना था। भले ही इसमें कुछ ऊपर का खर्चा हाे जाता लेकिन वो ना होता जब अब और आज हो रहा है। इसके अलावा जैसे ही नोटिस मिले थे अपने मकान में कारोबारी गतिविधियां तुरंत बंद कर देते। उसके बाद एक अर्जी आवास विकास में देते। यह अर्जी जो नोटिस दिया गया था उससे संबंधित होती। आवास विकास के अधिकारी मौके पर मुआयना करते थे और उनसे फिर फाइल में फाइनल रिपोर्ट लगवाते थे। अपनी आवास की फाइल को बंद कराते भले ही चार छह महीने बाद वहां दोबारा काम धंधा यानि जो काम नोटिस मिलने के बाद बंद कर दिया गया था उसको शुरू कर देते बस इतना सा काम करना था यह ना करके सब वो कुछ किया गया जिसकी जरूरत ही नहीं थी। जो करना था वो किसी ने किया नहीं नतीजा सबके सामने है।
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