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मालिकाना हक साबित करने में छू रहे पसीने

प्रमुख सचिव, निगम व आवास विकास को थमाए दिए गए हैं नोटिस

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मालिकाना हक साबित करने में छू रहे पसीना
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दो माह में भी पेश नहीं ६०४१ के मालिकाना हक के सबूत
जमीन को लेकर नगर निगम को हाईकोर्ट में पेश करना है सबूत

मेरठ/गढ़ रोड शास्त्रीनगर स्थित खसरा नंबर ६०४१ के मालिकाना हक के पेपर दो माह बाद भी हाईकोट में नहीं पेश किए जा सके हैं। मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की डबल बैंच कर रही है। बीती २५ मार्च को मामले की सुनवाई के लिए लगी थी, लेकिन नगर निगम की ओर से मालिकाना हक को लेकर कोर्ट में पेपर नहीं पेश किए जा सके। दरअसल हाईकोर्ट ने ६०४१ के मालिकाना हक को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट राहुल ठाकुर की ओर से दायर की गयी याचिका में नगर निगम, आवास विकास परिषद और प्रमुख सचिव नगर विकास उत्तर प्रदेश शासन को चुनौती दी गयी है। इस याचिका में कहा गया है कि नगर निगम ने खसरा ६०४१ पर कब्जा कर वहां पर कार्यालय का निर्माण शुरू कर दिया है। इसकी सुनवाई डबल बैच को करनी थी, लेकिन कोर्ट के एक ही जज बैठे थे। जिसकी वजह से सुनवाई नहीं की जा सकी। राहुल ठाकुर ने जानकारी दी कि पिछली सुनवाई होने तक नगर निगम की ओर से मालिकाना हक को लेकर कोई कागजात पेश नहीं किए जा सके। मालिकाना हक के कागज पेश करने में नगर निगम के पसीने छूट रहे है। इस बात को दो माह होने को आए। हाईकोर्ट में यह मामला जनवरी से चल रहा है।
यह है पूरा मामला
नई सड़क खसरा ६०४१ का मालिकाना हक अलीगढ़ के किसी रूप किशोर माथुर परिवार का बताया जाता है। जमीन का यह टूकड़ा एक अरसे से लावारिस अवथा में पड़ा था। इस खसरे के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जे कर लिए गए। तमाम दुकानें और मकान इसके हिस्से में बना लिए गए। शास्त्रीनगर नई सड़क पर इस से सटे इसके हिस्से पर लोगों ने खोखे डालकर वहां अवैध कब्जे कर लिए। इन अवैध कब्जो ं को कई बार हटाया भी गया, लेकिन नेताओं के इशारे पर दोबारा कब्जे कर लिए गए। बाद में नगर निगम ने जमीन पर से कब्जे हटाकर वहां चारों तरह कटीलें तार लगा दिए। काफी दिन तक यह खसरा ऐसा ही रहा। बाद में एकाएक नगर निगम प्रशासन ने वहां अपने कार्यालय का निर्माण शुरू करा दिया। इसको लेकर काफी नुकत्ताचीनी भी हुई, लेकिन निगम के दफ्तर का निर्माण बादस्तूर जारी रहा। इस बीच आवास विकास परषिद ने वहां किए जा रहे निर्माण को लेकर नगर निगम को नोटिस भी थमा दिया। बताया गया कि मेरठ विकास प्राधिकरण से मानचित्र स्वीकृत कराए बगैर ही नगर निगम वहां कार्यालय का निर्माण करा रहा है। यह बात अलग है कि आवास विकास आज भी अपने नोटिस पर कायम है और नगर निगम का मानचित्र मेडा से स्वीकृत नहीं है। हैरानी इस बात को लेकर है कि जब जमीन का मालिकाना हक ही नगर निगम का नहीं है तो फिर आवास विकास परिषद ने किस हैसियत से निगम को नोटिस थमा दिया। अवास विकास परिषद ने खसरा संख्या ६०४१ के मालिकाना हक जिसके दाखिल खारिज में नगर निगम का अभी तक कोई लेना देना नहीं बताया जा रहा है। उसका संज्ञान क्यों नहीं लिया गया। आरटीआई एक्टिविस्ट का आरोप है कि स्थानीय अधिकारी इस मामले में धालमेल पर उतारू हैं।

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