नई दिल्ली। भारत को आर्थिक संकट से उबारने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पड़ौसी देश चीन को भारत में निवेश का मौका दिया है। इसके लिए पहले से कड़े नियमों में कुछ ढील दी गई है। भारत ने चुनिंदा क्षेत्रों में चीनी निवेश पर लगी पाबंदियों में ढील देने को मंज़ूरी दे दी है। सरकार ने कहा कि इसका मक़सद पूंजी की कमी को घटाना है और छह साल के तनाव के बाद आर्थिक संबंधों में नए सिरे से शुरुआत करना है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की व्यापारिक नीतियों और मध्य पूर्व में जंग के कारण बढ़ी अनिश्चितता ने हालात को और नाज़ुक बना दिया है। शायद इसी वजह से छह साल के ठंडेपन के बाद भारत और चीन के बीच सरगर्मी बढ़ी है। साल 2020 में भारत ने चीनी कंपनियों के भारत में निवेश से जुड़े नियम कड़े कर दिए थे, लेकिन अब इसमें कुछ रियायत दी जा रही है। प्रधानमंत्री का प्रयास भारत को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाना है। इसी दशा में कुछ और भी दूसरे देशों को संभवत रियायत दी जा सकती हे। फिलहाल भारत के दरवाजे चीन के लिए खोले गए हें। दरअसल जून 2020 में भारत और चीन की सेना के बीच लद्दाख के गलवान में हुई हिंसक झड़प हुई थी। इस झड़प के बाद दोनों देशों के संबंध काफ़ी ख़राब हो गए थे।
इसके बाद से भारतीय कंपनियों में चीनी निवेशकों के लिए भारत के गृह और विदेश मंत्रालयों के अधिकारियों वाले एक पैनल से सुरक्षा मंज़ूरी लेना ज़रूरी कर दिया गया। इन पाबंदियों की वजह से कई सौदे रुक गए, इनमें 2023 में चीन की बीवाईडी का भारत में इलेक्ट्रिक कार के संयुक्त उपक्रम में एक अरब डॉलर निवेश करने की योजना भी शामिल थी।
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