मेरठ। कैंट बोर्ड के एमआरएफ (मैटेरियल रिकबरी फेसेलिटी ) सैंटर के तथ्यों या कहें रिकॉर्ड को लेकर बोर्ड के दो बड़े अफसर आमने सामने नजर आ रहे हैं। इन अफसरों में सीईओ कैंट जिन्होंने पीएमओ पोर्टल और सेनेट्री सेक्शन हेड ने आरटीआई में जो जानकारी मांगी उसके संदर्भ में जो सूचना दी वो परस्पर विरोधाभासी है। इसीलिए सवाल पूछा जा रहा है कि जिस प्रकरण की बात की जा रही है उसमें सीईओ ने जो जानकारी पीएमओ पोर्टल पर भेजी है वो सत्य है या फिर आरटीआई के उत्तर में जो जानकारी सेनेट्री सेक्शन हेड दे रहे हैं वो सच है। यदि एक सच है तो निश्चित रूप से दूसरी जानकारी मिथ्या मानी जाएगी।
यह पूरा मामला कैंट बोर्ड के अफसरों में संवादहीनता की ओर इशारा कर रहा है। दरअसल हुआ यह कि एमआरएफ को लेकर पीएमओ के पोर्टल पर एक जानकारी मांगी गयी थी। बताया गया है कि छावनी परिषद के सीईओ जाकिर हुसैन ने प्रधानमंत्री पोर्टल पर शिकायत के उत्तर में दावा किया था कि सभी आवश्यक रिकॉर्ड्स रखे जा रहे हैं, एसडब्लूएम, 2016 का पूर्ण अनुपालन हो रहा है और सरकारी खजाने को कोई नुकसान नहीं हुआ है। जो जानकारी पीएमओ पोर्टल पर भेजी गयी है उसमें कहा गया है कि सारा रिकॉर्ड मौजूद है। किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं हुआ है इसके इतर जब आरटीआई के तहत जनसूचना अधिकारी वीके त्यागी से जानकारी मांगी जाती है तो वो बताते हैं कि कहा – ‘रिकॉर्ड उपलब्ध ही नहीं। एमआरएफ कचरा प्रबंधन में यह एक बेहद गंभीर प्रशासनिक विरोधाभास”। साथ ही जानकारों का यह भी कहना है कि मामला रेवेन्यू से जुड़ा होने की वजह से यह बेहद गंभीर हो जाता है। जब रेवेन्यू से जुड़ा है और यदि किसी भी कारण के चलते उसमें सरकारी खजानों को रेवेन्यू की हानि हो रही है तो फिर क्यों ना जिम्मेदारी तय की जाए। लेकिन यह तो कैंट बोर्ड सीईओ ही तय स्पष्ट कर सकते हैं कि यदि रेवेन्यू लॉस है तो फिर उसके लिए जिम्मेदार कौन है। इससे भी बड़ी बात यह कि यदि एमआरएफ का रिकॉर्ड ही नहीं है तो फिर उसकी जिम्मेदारी किस पर है। कैंट बोर्ड रक्षा मंत्रालय के आधीन का काम करता है। देश के जितने भी मंत्रालय हैं उनमें रक्षा मंत्रालय को सैकेंड टू पीएमओ यानि प्रधानमंत्री कार्यालय के बाद दूसरा दर्जा हासिल होता है। और यदि रक्षा मंत्रालय के आधीन काम करने वाले मेरठ कैंट बोर्ड में एमआरएफ का रिकार्ड ही नहीं है जैसा कि आरटीआई में मांगी गई जानकारी के उत्तर में बताया गया है तो यह फिर रेवेन्यू लॉस से भी बड़ी खामी की श्रेणी में क्या नहीं आता। एमआरएफ के इस मामले को लेकर जो कुछ जानकारी सामने आयी है उसके बाद यह तो पूछा जा सकता है कि कैंट बोर्ड में आखिर चल क्या रहा है। एक ही मामले में मुख्य अधिशासी अधिकारी और जनसूचना अधिकारी— दोनों सीनियर अधिकारी — पूरी तरह विरोधाभासी आधिकारिक बयान दे रहे हैं। रिकॉर्ड के अभाव में “जीरो लॉस” का दावा — कानूनी रूप से असंगत और भ्रामक प्रतीत होता है। इसके इतर एमआरएफ में प्लास्टिक, मेटल, कॉरबोर्ड आदि रिसाइकेबल सामग्री का बाजार मूल्य काफी होता है। किन्तु सेरिगेशन यानि छंटाई रिकबरी और रेवेन्यू रिकॉर्ड के पूर्ण अभाव में कैंट बोर्ड के सीईओ द्वारा पीएमओ पोर्टल को बताया जाना कि “कोई नुकसान नहीं हुआ” का दावा आरटीआई के उत्तर के अनुसार कानूनी रूप से असंगत, तथ्यात्मक रूप से आधारहीन और पूरी तरह भ्रामक प्रतीत होता है। एमडब्लूम रूल्स , 2016 के तहत रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है, जिसका छावनी परिषद द्वारा उल्लंघन स्पष्ट दिख रहा है।
सीईओ और सीपीआईओ एक ही मामते में दो परस्पर विरोधी आधिकारिक जवाब कैसे दे सकते हैं। इसके लिए जिम्मेदार कौन है कौन सा उत्तर सही माना जाए। रिसाइकिल सामग्री का राजस्व कहां है। यदि राजस्व का रिकार्ड वाकई नहीं है जैसा कि आरटीआई में बताया गया है तो यह सरकारी खजाने को नुकसान के साथ ही राजस्व हानि का सीधा मामला बनता है और बड़ा सवाल कि क्या सीडीए ऑडिट में इसका संज्ञान लिया जाएगा।
तो क्या कागजों पर चल रहा है एमआरएफ सैंटर
यह मामला अब प्रशासनिक पारदर्शिता, सरकारी धन की सुरक्षा और एमएसडब्लू रूल्स उल्लंघन का गंभीर मुद्दा बन चुका है।
सीवीसी रक्षा मंत्रालय और सीपीसीबी को इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच करनी चाहिए। भाजपा के एक कदावर नेता ने नाम ना छापे जाने की शर्त पर बताया कि इस पूरे मामले को लेकर रक्षामंत्री, डीजी डिफैंसा और सीवीसी को शिकायत भेजी गयी है। उनका कहना है कि जो कुछ चल रहा है वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति के एकदल उलट नजर आ रहा है जो किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं है।
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