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रूस के वीटो के डर से यूक्रेन से किनारा

रूस के वीटो के डर से यूक्रेन से किनारा

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रूस के वीटो के डर से यूक्रेन से किनारा
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आलाेचकों व पश्चिम देशों ने यूक्रेन के संकट का जिक्र ना किए जाने की वजह से बताया पूरी तरह से निराशाजनक

नई दिल्ली। ब्रिक्स के संयुक्त घोषणा पत्र में यूक्रेन संकट से किनारा कर लिए जाने की पीछे रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की नाराजगी का जोखिम मोल ना लिए जाना बताया जा रहा है। कुछ आलोचक इसको सम्मेलन की विफलता के तौर पर देख रहे हैं, हालांकि सरकार का एक पक्ष इसको कूटनीति करार दे रहा हे। ब्रिक्स में रूस खुद एक संस्थापक और अत्यंत प्रभावशाली सदस्य है। यदि घोषणापत्र में यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस की आलोचना की जाती, तो रूस इस पर वीटो कर देता। ऐसी स्थिति में कोई भी साझा घोषणापत्र जारी नहीं हो पाता, जिससे पूरा शिखर सम्मेलन ही पूरी तरह टूट जाता। ब्रिक्स (BRICS) संगठन में रूस के ‘वीटो’ या विरोध के प्रभाव के कारण यूक्रेन युद्ध से जुड़े सीधे प्रस्तावों या कड़े बयानों से किनारा किया जाता रहा है। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित BRICS Summit 2026 में यह स्थिति बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने आई है, जहाँ जारी किए गए साझा घोषणापत्र (New Delhi Declaration) से यूक्रेन युद्ध के जिक्र को पूरी तरह हटा दिया गया

पश्चिम देशों की नजर विफलता

पश्चिमी देशों और दूसरे आलोचकों का मानना है कि यह पिछले सम्मेलनों की तुलना में एक कदम पीछे हटना है। साल 2024 के कज़ान (रूस) और 2025 के रियो डी जेनेरियो (ब्राजील) शिखर सम्मेलनों में यूक्रेन संकट के लिए बाकायदा एक अलग पैराग्राफ समर्पित किया गया था। इस बार इसका पूरी तरह गायब होना कूटनीतिक समझौते की सीमा को दर्शाता है। यूक्रेन और पश्चिमी देशों के समर्थकों का तर्क है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित करने वाले दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संकटों में से एक को इस घोषणापत्र में पूरी तरह छोड़ देना इस मंच की भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है।

निष्कर्ष

इसे ‘विफलता’ के बजाय ‘कूटनीतिक समझौता (Diplomatic Compromise)’ कहना अधिक सटीक होगा। भारत और अन्य ब्रिक्स देशों ने समूह की एकजुटता बनाए रखने और आर्थिक, वित्तीय तथा तकनीकी सहयोग (जैसे क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स और AI) पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इस संवेदनशील मुद्दे को साझा दस्तावेज से दूर रखना ही बेहतर समझा। इस कूटनीतिक समझौते के कारण ही सदस्य देश वित्तीय सहयोग, नए देशों के प्रवेश और ग्लोबल साउथ (Global South) के विकास जैसे अन्य महत्वपूर्ण समझौतों पर आम सहमति बना सके।
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