साकेत थाने में दो महिला पत्रकारों से की गयी कथित मारपीट के बाद हुए बवाल के बाद दर्ज करना पड़ा पुलिस वालों पर मुकदमा
नई दिल्ली। डिजिटल प्लेटफार्म की दो मुस्लिम महिला पत्रकारों से कथित मारपीट के बाद दिल्ली पुलिस को अपने ही पुलिस वालों पर मुकदमा दर्ज करना पड़ गया लेकिन यह इतना आसान नहीं था। लेकिन पुलिस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और रात भर थाना साकेत के घेराव के बाद ही मजबूर पुलिस को अपने खिलाफ एफआईआर लिखनी पड़ी। पीड़ित महिला पत्रकारों के आरोपों के आधार पर, यह एफआईआर कथित तौर पर मारपीट, गाली-गलौज और गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखने वाले साकेत थाने के दोषी पुलिसकर्मियों (विशेषकर इसमें शामिल महिला पुलिसकर्मियों और थाना अधिकारियों) के खिलाफ दर्ज कराई गई है। पत्रकार संगठनों और प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग साकेत थाने के एसएचओ (SHO) दिनेश कुमार तथा इस घटना में शामिल अन्य दोषी पुलिसकर्मियों को तुरंत निलंबित करने और उन पर दंडात्मक कानूनी कार्रवाई करने की है। दिल्ली के साकेत थाने में महिला पत्रकारों के साथ मारपीट के मामले में जो प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है, वह “अज्ञात पुलिसकर्मियों” (Unidentified Police Personnel) या “साकेत थाने के दोषी स्टाफ” के खिलाफ दर्ज की गई है। पीड़ित पत्रकारों और प्रदर्शनकारी संगठनों ने साकेत थाने के एसएचओ दिनेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत में कहा गया है कि उनके निर्देश पर ही दोनों पत्रकारों को अलग-अलग कमरों में ले जाया गया। एफआईआर मुख्य रूप से उन महिला पुलिसकर्मियों और स्टाफ के खिलाफ केंद्रित है, जिन्होंने थाने के अंदर ले जाकर पत्रकारों के साथ कथित तौर पर मारपीट की, थप्पड़ मारे और धार्मिक पहचान पूछकर दुर्व्यवहार किया। कानूनी नियमों के अनुसार, जब तक दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) के आधार पर प्राथमिक जांच पूरी नहीं हो जाती या किसी पुलिसकर्मी की प्रत्यक्ष भूमिका आधिकारिक रूप से स्थापित नहीं होती, तब तक तत्काल निलंबन नहीं किया जाता। वर्तमान में मामला वरिष्ठ अधिकारियों की जांच के अधीन है। एफआईआर ‘अज्ञात पुलिसकर्मियों’ के खिलाफ दर्ज की गई है, इसलिए पुलिस पहले उन महिला पुलिसकर्मियों और थाना स्टाफ की पहचान (Identification) सुनिश्चित कर रही है जो उस समय ड्यूटी पर तैनात थे। जैसे कि मांग की जा रही है कि निलंबन कब होगा यह पूरी तरह दिल्ली पुलिस की आंतरिक जांच की रिपोर्ट और पहचान प्रक्रिया पर निर्भर करता है। जैसे ही जांच अधिकारी (IO) अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे, दोषी कर्मियों पर प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की निलंबन की मांग
पीड़ित पत्रकारों और खासतौर से प्रेस क्लब ऑफ इंडिया जैसे बड़े संगठन की मुख्य मांग यही है कि जांच के ज़रिए उन सभी दोषी अधिकारियों की पहचान कर उन्हें तुरंत निलंबित किया जाए। मुस्लिम होने की वजह से महिला पत्रकारों से मारपीट का यह मामला दुनिया भर के मीडिया में वायरल हो रहा है। वीवीसी ने इसको खास तवज्जो दी है। पूरी रिपोर्ट दुनिया भर में वायरल की गई है। इसके बाद सरकार पर भी आरोपी पुलिस वालों पर एफआईआर चौतरफा प्रेशर बनने लगा तब कहीं जाकर आरोपी पुलिस वालों पर मुदकमा लिखा जा सका।
पहले करते रहे आरोपों को खारिज
दिल्ली पुलिस ने शुरुआती बयानों में मारपीट के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया था और पत्रकारों पर वीवीआईपी (VVIP) रूट में बाधा डालने का दावा किया था। हालांकि, चौतरफा दबाव के बाद पीड़ित पक्ष की एफआईआर दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी गई है। हालांकि दिल्ली पुलिस ने शुरुआती बयानों में इन आरोपों को “तथ्यात्मक रूप से गलत” बताया है, लेकिन कानून व्यवस्था और चौतरफा दबाव के कारण पुलिस ने शिकायत दर्ज कर जांच को आगे बढ़ाया है। वर्तमान में किसी भी अधिकारी के आधिकारिक तौर पर सस्पेंड होने या गिरफ्तार होने की पुष्टि नहीं हुई है, मामला अभी जांच के अधीन है।
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