जीडीपी को लेकर जो आंकड़े भाजपा पेश कर रही है उनको पूर्व वित्त सचिव समेत कई अर्थशास्त्रियों ने एक सिरे से किया खारिज
नई दिल्ली। बकौल पीएम मोदी GDP 7.8% फिर भी भारतीय जनता पार्टी जश्न से मनाने का साहस क्यों नहीं दिखा पा रही है यह सवाल पूछा जा रहा है।चालू वित्त वर्ष (2026-27) की पहली तिमाही में 7.8% की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर आने के बाद भी भाजपा और केंद्र सरकार पूरी तरह जश्न मनाने के बजाय राजनीतिक रूप से बचाव और पलटवार की मुद्रा में है। इसका मुख्य कारण पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के दावे और विपक्ष द्वारा आंकड़ों की गणना (मेथोडोलॉजी) पर उठाए गए गंभीर सवाल हैं। अर्थशास्त्रियों (जैसे प्रो. अरुण कुमार) का तर्क है कि जीडीपी के तिमाही आंकड़े केवल कॉर्पोरेट और औपचारिक क्षेत्र की वृद्धि दिखाते हैं। भारत का 94% श्रम बल असंगठित क्षेत्र में है, जो बेरोजगारी (Unemployment), महंगाई (Inflation) और असमानता (Unequal wealth) से जूझ रहा है। विपक्ष का सवाल है कि यदि विकास दर इतनी ही तेज है, तो देश की 80 करोड़ आबादी को मुफ्त राशन पर क्यों निर्भर रहना पड़ रहा है?
पूर्व वित्त सचिव ने लगाया पलीता
जीडीपी बमबम होने के दावों के बाद भी भाजपा का जश्न ना मनाने के पीछे वजह पूर्व वित्त सचिव का पलीता माना जा रहा है।पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने आरोप लगाया कि सरकार ने पिछले वर्ष (Q1 FY26) के जीडीपी अनुमान को ₹86.05 लाख करोड़ से घटाकर ₹80 लाख करोड़ कर दिया। उनका तर्क है कि इस 6 लाख करोड़ रुपये की कटौती (लोअर बेस) के कारण इस साल की वृद्धि दर कृत्रिम रूप से 7.8% दिखाई दे रही है, जबकि पुरानी सीरीज के हिसाब से वास्तविक विकास दर महज 2.6% या उसके आसपास होती।
बचाव की मुद्रा
सरकार और भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि यह बदलाव जानबूझकर नहीं किया गया है, बल्कि जीडीपी का नया बेस ईयर (2022-23) लागू करने और ‘डबल डिफ्लेटर’ जैसी आधुनिक सांख्यिकीय पद्धतियों को अपनाने के कारण हुआ है। उनका तर्क है कि दो अलग-अलग सीरीज के आंकड़ों की सीधी तुलना करना गलत है।
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