जो भी कलाकार राजनीति में आए वो सफल हुए या अफसल लेकिन उन्हें इंडस्ट्रीज का साथ दोबार नहीं मिला
नई दिल्ली।भारतीय फिल्म इंडस्ट्री (बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा) वैचारिक रूप से भाजपा (BJP) और कांग्रेस (Congress) के बीच बंटी हुई नजर आती है। पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक मुद्दों, सामाजिक बहसों और फिल्मों के विषयों को लेकर फिल्मी हस्तियों के बीच यह विभाजन काफी खुलकर सामने आया है। राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, सुनील दत्त, नरगिस, दलीप कुमार, राजकपूर, गोविंदा, हेमा मालिनी, सनी देओल सरीखे इंडस्ट्रीज के बड़े नामों को कांग्रेस समर्थकों में शुमार किया जाता है। हालांकि साल 2014 के बाद इंडस्ट्रीज के तमाम ऐसे सितारे रहे जो राजनीतिक में लाइफ सेटल करने के लिए भाजपा में शामिल हुए और अनुपम खेर, कंगना रणौत और स्मृति इरानी, विवेक अग्निहोत्री, सरीखों को इससे फायदा भी हुआ। अक्षय कुमार / अजय देवगन की बात करें तो ये कलाकार सीधे राजनीति में तो नहीं हैं, लेकिन इनकी कई फिल्में (‘मिशन मंगल’, ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’, ‘तानाजी’) सरकार के अभियानों और राष्ट्रीय गौरव को बढ़ावा देती हैं। कांग्रेसी विचारधारा की बात करें तो स्वरा भास्कर / ऋचा चड्ढा सरीखे कलाकार सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सरकार की मुखर विरोधी माने जाते हैं। उर्मिला मातोंडकर / राज बब्बर जो सीधे तौर पर कांग्रेस पार्टी से जुड़कर चुनाव लड़ चुके हैं। इनके अलावा कई छोटे कलाकार चुनाव लड़ सांसद भी बने हैं।
ऐसे कलाकार जो हैं तटस्थ
हालांकि बॉलीवुड में ऐसे भी कलाकारों की कोई कमी नहीं है जो भाजपा और कांग्रेस की राजनीति में फंसते नहीं। इससे खुद को दूर रखते हैं। खान सुपरस्टार्स (शाहरुख, सलमान, आमिर) जैसे बड़े नाम आमतौर पर सीधे तौर पर किसी भी राजनीतिक दल का पक्ष लेने से बचते हैं। शुरू में कांग्रेसी रहे अमिताभ बच्चन ने भी राजनीति से किनारा कर लिया लेकिन उनकी पत्नी जयाभादुड़ी सक्रिय राजनीति का हिस्सा हैं। उनकी गिनती सपा के बड़े नेताओं में होती है। फिल्म उद्योग का मुख्य उद्देश्य व्यापार और मनोरंजन है, इसलिए अधिकांश निर्माता-निर्देशक राजनीतिक विवादों से दूर रहकर दोनों ही पक्षों के दर्शकों को आकर्षित करना पसंद करते हैं।
राजनीति ने इनका चौपट कर दिय कैरियर
यह कहना पूरी तरह गलत नहीं होगा कि राजनीति में कदम रखना कई बॉलीवुड स्टार्स के लिए उनके फिल्मी करियर के पतन (डाउनफॉल) का कारण बना। जब कोई स्थापित अभिनेता अपने स्टारडम के शिखर पर या एक महत्वपूर्ण मोड़ पर राजनीति में आता है, तो अक्सर फिल्मों के लिए समय न मिल पाना, विवादों में फंसना या जनता की नाराजगी उनके करियर को चौपट कर देती है। गोविंदा की बात करें तो राजनीति में आने के बाद वह फिल्मों को समय नहीं दे पा रहे थे। उन पर क्षेत्र की जनता की अनदेखी करने के आरोप लगे। 2008 में जब तक उन्होंने राजनीति छोड़ी, तब तक बॉलीवुड में उनका वो पुराना जादुई स्टारडम और मेकर्स का भरोसा पूरी तरह खत्म हो चुका था। बाद में उन्होंने खुद इंटरव्यूज में माना कि राजनीति में जाना उनके करियर की बड़ी भूल थी। अमिताभ बच्चन ने अपने सुपरस्टारडम के चरम पर थे, जब उन्होंने अपने मित्र राजीव गांधी के कहने पर 1984 में इलाहाबाद (प्रयागराज) से चुनाव लड़ा और ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उर्मिला मार्तोडकर ने 90 के दशक की मशहूर एक्ट्रेस उर्मिला मातोंडकर ने 2019 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गईं। बाद में वे शिव सेना में शामिल हो गईं। ‘शॉटगन’ के नाम से मशहूर शत्रुघ्न सिन्हा बॉलीवुड के उन चुनिंदा कलाकारों में से हैं जो राजनीति में बेहद सफल रहे और कैबिनेट मंत्री भी बने। राजनीति में मिलने वाली इस अपार सफलता की कीमत उन्हें अपने फिल्मी करियर को दांव पर लगाकर चुकानी पड़ी।
चुकानी पड़ती है कीमत
जब कोई स्टार किसी खास राजनीतिक दल से जुड़ता है, तो विरोधी विचारधारा वाले दर्शक उसकी फिल्में देखना बंद कर देते हैं, जिससे उनका बॉक्स ऑफिस मार्केट खराब हो जाता है। फिल्म मेकर्स ऐसे सितारों को साइन करने से कतराते हैं जो लगातार राजनीतिक विवादों या बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं, क्योंकि इससे फिल्म के बॉयकॉट होने का खतरा बढ़ जाता है।
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