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असत्य वचनों की वजह से सती ने सहा शिव से वियोग

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से सात दिनी श्रीशिव कथा

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असत्य वचनों की वजह से सती ने सहा शिव से वियोग
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मेरठ/असत्य वचनों की वजह से ही सती को शिव से वियोग सहना पड़ा। दिव्य जयोति जाग्रति संस्थान की ओर से गढ़ रोड बुद्धागार्डन में आयोजित सात दिवसीय शिव कथा में डा. सर्वेश्वर ने यह प्रसंग सुनाया। कथा-व्यास डॉ. सर्वेश्वर ने सती प्रसंग का भजनों एवं चौपाइयों के साथ व्याख्यान किया। भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी सती को संग लेकर अगस्त्य मुनि के आश्रम में प्रभु राम की पावन कथा श्रवण करने जाते हैं, परन्तु तर्कबुद्धि से प्रेरित हुईं सती कथा का मर्म नहीं जान पातीं। जिस कारण जब वे प्रभु श्री राम को साधारण नर-लीला करते हुए देखती हैं, तो उन्हें संशय हो जाता है कि वह ईश्वर, जो परब्रह्म, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, मायारहित और इच्छा रहित है, वह शरीर कैसे धारण कर सकता है। महादेव के कहने पर वे प्रभु श्री राम की परीक्षा लेने जाती हैं, किन्तु असफल हो जाती हैं। लौटकर वे शिव से असत्य वचन कह देती हैं, जिसके कारण उनका शिव से पुन: वियोग हो जाता है। भगवान शिव स्वयं अपने मुख से बताते हैं कि ईश्वर तर्क-वितर्क, मन, वाणी और बुद्धि से अति परे है। तर्क बुद्धि से दिया जाता है, और जिसकी बुद्धि जितनी अधिक तीव्र होगी, वह उतना ही अच्छा तर्क देगा। रावण ने भी, जो वेदों का ज्ञाता था, बुद्धि से राम जी को समझने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहा। ईश्वर तर्क का नहीं, अपितु प्रत्यक्ष दर्शन का विषय है। समय के पूर्ण सद्गुरु द्वारा दिव्य दृष्टि उद्घाटित होने के पश्चात ही ईश्वर को देखा व समझा जा सकता है। अत: एक तत्ववेत्ता सद्गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर उस ईश्वर का घट में दर्शन प्राप्त करना चाहिए।

इस दिव्य आयोजन में सैकड़ों श्रद्धालुओं एवं गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। विशिष्ट अतिथियों के रूप में उपस्थित रहे – आर के भटनागर (पूर्व आयुक्त), कपिल शर्मा (प्रधानाचार्य, सरस्वती शिशु मंदिर, कसेरू खेड़ा), एस.के.मित्तल आदि मौजूद रहे। संस्थान के प्रतिनिधि स्वामी नरेशानंद जी ने बताया कि यह पावन कथा ‘गौ संरक्षण प्रकल्प—कामधेनुÓ को समर्पित है। संस्थान का सामाजिक प्रकल्प ‘कामधेनुÓ भारतीय गाय के महत्व को पुन: स्थापित करने पर केंद्रित है। ‘कामधेनुÓ लोगों के सामाजिक-आध्यात्मिक जीवन तथा स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि एवं आर्थिक क्षेत्रों में गाय के योगदान के प्रति जागरूकता फैला रहा है और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को सक्रिय रूप से बढ़ा रहा है, जिससे भारतीय गायों के संरक्षण की अंतर्निहित आवश्यकता उत्पन्न हो रही है।
मंच पर दिव्य गुरु आशुतोष महाराज के प्रतिभाशाली संगीतकार शिष्यों ने अपनी मधुर, भावपूर्ण वाणी में महादेव के सुमधुर भजनों की ऐसी अनुपम प्रस्तुति दी कि समस्त वातावरण भगवान भोलेनाथ की भक्ति से सराबोर हो उठा। कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षणों में सुसज्जित भोलेनाथ का दिव्य दरबार एवं मनोहारी झांकियाँ विशेष रूप से अविस्मरणीय रहीं।

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