कोर्ट ने कहा- कमियां सामने लाने वाले को निशाना बनाना ‘आईना दिखाने वाले को ही दोषी ठहराने’ जैसा।
नई दिल्ली/लखनऊ। सरकारी स्कूल की बदहाल स्थिति और बुनियादी सुविधाओं की कमी को उजागर करने वाले पत्रकार अमित यादव के खिलाफ दर्ज एफआईआर के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने एफआईआर के आधार पर आगे की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी है। मामला लखनऊ के गोसाईंगंज क्षेत्र के बेगरियामऊ स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालय से जुड़ा है। याचिका के अनुसार पत्रकार अमित यादव ने 20 अगस्त को पत्रकारिता के सिलसिले में स्कूल का दौरा किया था। वहां स्कूल के शौचालयों की खराब स्थिति और विद्यार्थियों के लिए पेयजल की व्यवस्था नहीं होने समेत अन्य कमियों को रिपोर्ट किया गया था। उन्होंने कुछ शिक्षकों से भी बातचीत की थी। रिपोर्टिंग के चार दिन बाद, 24 अगस्त को उनके खिलाफ गोसाईंगंज थाने में एफआईआर दर्ज की गई।
FIR प्रतिशोधात्मक कार्रवाई
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने की। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि स्कूल की कमियां उजागर किए जाने के बाद पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर प्रतिशोधात्मक कार्रवाई जैसी प्रतीत होती है। अदालत ने टिप्पणी की कि कमियों को सामने लाने वाले पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई करना ‘आईना दिखाने वाले को ही दोषी ठहराने’ जैसा है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अधिकारियों को स्कूल की कमियों को प्रतिष्ठा या अहं का विषय बनाने के बजाय उन्हें सुधारने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने इस कार्रवाई को ‘किलिंग द मैसेंजर’ जैसी स्थिति बताया।
अपर मुख्य सचिव को नोटिस
हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव, बेसिक शिक्षा विभाग को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। हलफनामे में संबंधित स्कूल की वर्तमान स्थिति और स्कूल परिसर की तस्वीरें भी पेश करने को कहा गया है।गौरतलब है कि इससे पहले स्कूल की प्रभारी अध्यापिका की शिकायत पर पत्रकार अमित यादव और उनके साथियों के खिलाफ बिना अनुमति स्कूल परिसर में वीडियो बनाने, सरकारी काम में बाधा डालने और अन्य आरोपों के संबंध में मुकदमा दर्ज किया गया था। यह आरोप शिकायत में लगाए गए थे; हाईकोर्ट का मौजूदा आदेश एफआईआर पर रोक से संबंधित है। हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप को पत्रकारिता के जरिए सार्वजनिक संस्थानों की कमियों को सामने लाने और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े मामले के तौर पर देखा जा रहा है।
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