महिलाओं के प्रति अपशब्दों को लेकर सेलेक्टिव होने पर सोशल मीडिया पर हो रहे बुरी तरह ट्रोल
मुंबई/नई दिल्ली: बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर द्वारा हाल ही में देश में चल रहे सीजेपी (CJP) और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच एक वीडियो जारी करने के बाद राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है। अनुपम खेर ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा और अपशब्दों के इस्तेमाल पर गहरी आपत्ति जताई और कहा कि देश के प्रधानमंत्री के लिए ऐसी अमर्यादित भाषा का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इस बयान के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने अनुपम खेर के इस रुख पर असहमति जताते हुए उन पर राजनीतिक रूप से चुनिंदा रवैया अपनाने और ‘दोहरे चरित्र’ का आरोप लगाना शुरू कर दिया है। यूजर्स का तर्क है कि जहां अभिनेता प्रधानमंत्री के प्रति अपमानजनक शब्दों से आहत महसूस करते हैं, वहीं जब विपक्षी नेताओं, विशेषकर संसद में महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां की जाती हैं, तब उनका यह सार्वजनिक विरोध और संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती।
‘चुनिंदा आक्रोश’ (Selective Outrage)
सोशल मीडिया पर एक बड़े धड़े ने उनके इस बयान को एकतरफा बताते हुए अतीत की कई राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख किया है, जिन्हें आधार बनाकर उन पर ‘चुनिंदा आक्रोश’ (Selective Outrage) का आरोप लगाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर यह सवाल उठा रहा है कि लोकतांत्रिक मर्यादा और भाषा की शुचिता केवल प्रधानमंत्री या सत्तापक्ष के नेताओं तक ही सीमित क्यों होनी चाहिए? क्या राजनीतिक असहमति के दौरान किसी भी महिला नेता या विपक्ष के नेताओं को निशाना बनाए जाने पर भी समान रूप से आक्रोश व्यक्त नहीं किया जाना चाहिए?
प्रधानमंत्री के ये विवादित बयान
रेणुका चौधरी की हंसी पर ‘रामायण’ वाली टिप्पणी (2018): सबसे प्रमुख घटना फरवरी 2018 की है, जब संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी जोर से हंस पड़ी थीं। इस पर टोकते हुए प्रधानमंत्री ने तत्कालीन सभापति वेंकैया नायडू से कहा था, “सभापति जी, मेरी आपसे प्रार्थना है कि रेणुका जी को कुछ मत कहिए। रामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का सौभाग्य आज मिला है।” इस टिप्पणी को विपक्ष और महिला संगठनों ने महिला विरोधी और अत्यंत आपत्तिजनक माना था, क्योंकि इसे परोक्ष रूप से रामायण के ‘राक्षसी’ पात्रों से जोड़कर देखा गया।
सोनिया गांधी के लिए ‘कांग्रेस की विधवा’ का तंज (2018): दिसंबर 2018 में राजस्थान के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने एक रैली में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम लिए बिना उन पर तीखा हमला बोला था। उन्होंने कथित तौर पर कहा था, “कांग्रेस की कौन सी विधवा थी जिसके खाते में पैसा जाता था?” इस बयान को लेकर कांग्रेस ने देशव्यापी विरोध जताया था और इसे एक विधवा महिला के आत्मसम्मान और गरिमा पर सीधा प्रहार बताया था।
ममता बनर्जी पर ‘दीदी-ओ-दीदी’ का कटाक्ष (2021): पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हर रैली में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को संबोधित करते हुए एक खास लहजे में ‘दीदी-ओ-दीदी’ कहना भी भारी विवादों में रहा था। तृणमूल कांग्रेस (TMC) और कई महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे महिलाओं को चिढ़ाने (Eve-teasing) और उनका उपहास उड़ाने वाला अमर्यादित तरीका करार दिया था।
बांग्लादेश में शेख हसीना पर ‘महिला होने के बावजूद’ वाली टिप्पणी (2015): वर्ष 2015 में अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान ढाका यूनिवर्सिटी में भाषण देते हुए पीएम मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना के कड़े कदमों की सराहना की थी, लेकिन उनके शब्द थे: “एक महिला होने के बावजूद उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की घोषणा की है।” इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर वैश्विक स्तर पर लैंगिक पूर्वाग्रह (Sexism) को लेकर तीखी आलोचना हुई थी।
खेर की ‘नैतिक चेतना’ क्यों नहीं जागी?
इन घटनाओं का उल्लेख करते हुए सोशल मीडिया यूजर्स अनुपम खेर से सवाल कर रहे हैं कि देश के शीर्ष सदन और चुनावी मंचों पर जब इन प्रतिष्ठित महिला नेताओं के प्रति इस तरह की भाषा और उपहास का उपयोग किया गया, तब उनकी ‘नैतिक चेतना’ क्यों नहीं जागी?
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