राहुल प्रियंका मल्लिकार्जुन खड़ेगे, अखिलेश व तेजस्वी और संजय राउत के अलावा वामपंथी भी शामिल
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आज विपक्षी INDIA गठबंधन के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों (SIR विवाद) को लेकर एक विशाल विरोध प्रदर्शन किया। इसमें सांसद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के अलावा मल्लिकार्जुन खड़ेगे, सांसद अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, संजय राउत के अलावा अलावा वामपंथी दलों (CPI-M, CPI), DMK, NCP (शरद चंद्र पवार), और शिवसेना (UBT) के कई सांसद और वरिष्ठ नेता इस मार्च में कंधे से कंधा मिलाकर चलते नजर आए। संसद भवन से लेकर सुप्रीम कोर्ट की तरफ बढ़ने वाले इस मार्च के कारण दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में भारी राजनीतिक सरगर्मी देखी गई। वहीं दूसरी ओर विपक्ष के पैदल मार्च के बाद मोदी सरकार के ज्ञानेश को लेकर अंडरप्रेशर होने से इंकार नहीं किया जा रहा है।
बेतहाशा भीड़
विपक्ष के इस ‘चलो दिल्ली’ मार्च में हजारों की संख्या में समर्थक और प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। बाराखंबा रोड और मंडी हाउस के आसपास का पूरा इलाका विपक्ष के झंडों, पोस्टरों और नारों से पटा हुआ था। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बावजूद भीड़ इतनी अधिक थी कि पुलिस को मार्च को रोकने के लिए कई स्तरों पर बैरिकेडिंग करनी पड़ी। आखिरकार भगवान दास रोड के पास पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को सुप्रीम कोर्ट की तरफ बढ़ने से रोक दिया, जिसके बाद विपक्ष के कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में भी लिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाल के दिनों में यह चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का सबसे बड़ा और आक्रामक सड़क प्रदर्शन है।
संसद और आंतरिक टकराव के खुलासे
मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि चुनाव आयोग के भीतर ही आंतरिक मतभेद गहरे हैं। पिछले 10 महीनों में अन्य चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया सहित विभिन्न नीतिगत फैसलों पर लगभग 14 बार लिखित रूप से अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। विपक्ष इसे आधार बनाकर ज्ञानेश कुमार को घेर रहा है। यह मामला केवल सड़कों पर ही नहीं, बल्कि देश की शीर्ष अदालत में भी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि ज्ञानेश कुमार ने अन्य आयुक्तों की सहमति के बिना एकतरफा निर्णय लिए हैं। कोर्ट की टिप्पणियां इस मामले में सबसे निर्णायक साबित हो सकती हैं।
जनता के बीच एक बड़ी बहस
इस मार्च ने भले ही सरकार को सीधे तौर पर कोई कानूनी कदम उठाने पर मजबूर न किया हो, लेकिन चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और पारदर्शिता को लेकर आम जनता के बीच एक बड़ी बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और शीतकालीन सत्र में यह मुद्दा और गरमाने के पूरे आसार हैं।
Leave a comment