सुप्रीम कोर्ट में भर्ती का डेटा तलब, हालांकि शिक्षकों की सेवा समाप्त करने का अभी तक कोई आदेश नहीं
मेरठ। उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी और बहुचर्चित 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत में तीखी बहस का केंद्र बनी हुई है। त्योहारी सीजन के दौरान सोशल मीडिया और विभिन्न हलकों में फैली इन खबरों कि “69 हजार शिक्षकों की नौकरी छिन गई है”, उसे लेकर वस्तुस्थिति बिल्कुल अलग है। कानूनी प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती का पूरा डेटा मांगा है, लेकिन किसी भी कार्यरत शिक्षक की सेवा समाप्त करने का कोई आदेश जारी नहीं किया है। अक्टूबर 2026 के पहले हफ्ते में हुई सुनवाई के दौरान, जस्टिस एस.बी. भट्टी और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने 19,000 सीटों पर आरक्षण में गड़बड़ी के विवाद को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार से भर्ती की मूल चयन सूची और उम्मीदवारों का विस्तृत डेटा मांगा है।
योगी सरकार ने दिया भरोसा
त्योहारी माहौल के बीच कार्यरत शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि वर्ष 2020 से कार्यरत 67,867 शिक्षकों के पदों पर कोई आंच नहीं आएगी। दावा किया गया है कि वर्तमान में सेवा दे रहे किसी भी शिक्षक को नहीं हटाया जाएगा। यदि इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशानुसार संशोधित मेरिट लिस्ट तैयार होने पर कुछ नए उम्मीदवार योग्य पाए जाते हैं, तो सरकार उन्हें उपलब्ध रिक्त सीटों पर समायोजित (Adjust) करेगी।
फंसा है पेंच
इस मामले में आरक्षण के अलावा एक और बड़ा पेंच बीएड बनाम बीटीसी उम्मीदवारों की पात्रता को लेकर फंसा है। अनारक्षित वर्ग के वकीलों ने दलील दी कि यदि चयन सूची पर दोबारा विचार होता है, तो बीएड धारकों को प्राथमिक शिक्षक भर्ती से बाहर कर केवल बीटीसी धारकों को पात्र माना जाए। हालांकि, इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा कि, “यदि भर्ती के समय नियमों के मुताबिक बीएड अभ्यर्थी योग्य थे, उन्होंने परीक्षा पास की और अधिक अंक प्राप्त किए, तो सिर्फ बीटीसी न होने के कारण अधिक अंक वाले करीब 35,000 कार्यरत बीएड शिक्षकों को सेवा से कैसे बाहर किया जा सकता है?” कोर्ट की इस टिप्पणी से कार्यरत बीएड शिक्षकों को काफी मानसिक संबल मिला है।
ये है विवाद
यह भर्ती परीक्षा उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिसंबर 2018 में विज्ञापित की गई थी और जनवरी 2019 में इसकी परीक्षा आयोजित की गई। परिणाम आने के बाद आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि बेसिक शिक्षा नियमावली और आरक्षण के नियमों (ओवरलैपिंग नियम) की अनदेखी की गई, जिससे हजारों ओबीसी (OBC) और एससी (SC) वर्ग के प्रतिभावान छात्र चयन सूची से बाहर हो गए। इसके बाद से ही यह मामला लगातार हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाइयों में उलझा हुआ है। वर्तमान स्थिति के अनुसार, त्योहारों के इस मौके पर किसी भी शिक्षक की नौकरी नहीं छिनी है। मामला पूरी तरह से देश की शीर्ष अदालत के विचाराधीन है और अगली सुनवाई में सरकार द्वारा सौंपे जाने वाले डेटा के आधार पर मेरिट और नियमों की समीक्षा की जाएगी।
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