एफिल टावर से महिलाओं को हटाने के चलते दुनिया भर में स्वामी नारायण संप्रदाय को लेकर शुरू हो गया विवाद
नई दिल्ली। क्या स्वामी नारायण संप्रदाय महिलाओं को अछूत मानता है। इसको लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब एफिल टावर पर स्वामी नारायण संस्था का प्रतिनिधि मंडल पहुंचने वाला था और उनके पहुंचने से पहले महिला स्टाफ को हटा दिया गया। हालांकि एफिल टावर मैनेजमेंट ने इसको लेकर महिला स्टाफ से माफी मांगी है। 19वीं सदी की शुरुआत में, जब हिंदू धर्म के भीतर कई संप्रदाय पहले से ही मौजूद थे, तब घनश्याम पांडे ने 1801 में एक नई परंपरा की शुरुआत की और इसे स्वामीनारायण संप्रदाय नाम दिया। तब से इस संप्रदाय का मुख्यालय भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात में रहा है। साल 1801 में इसकी स्थापना के बाद से स्वामीनारायण परंपरा में शिष्यों के लिए, खासकर उसके संतों के ब्रह्मचर्य का पालन करने को लेकर, कड़े नियम रहे हैं। स्वामीनारायण के प्राचीन ग्रंथ ‘शिक्षापत्री’ के अनुसार, संत किसी महिला को छू या देख नहीं सकते। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि महिलाओं को इस प्रकार से अछूत मानने वाले स्वामी नारायण संप्रदाय के लोग बगैर महिला के पैदा हो गए हैं।
क्या है विवाद
फ्रांस की राजधानी पेरिस में स्थित प्रसिद्ध एफिल टावर (Eiffel Tower) पर सितंबर 2026 में BAPS स्वामीनारायण संस्था के एक प्रतिनिधिमंडल के दौरे के दौरान महिला स्टाफ को हटाए जाने को लेकर लैंगिक विवाद खड़ा हो गया है। 5 सितंबर 2026 को BAPS स्वामीनारायण संस्था (बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था) से जुड़े लगभग 100 संत और अनुयायी पेरिस के पास एक नए मंदिर के उद्घाटन के सिलसिले में फ्रांस गए थे। इसी दौरान उन्होंने एफिल टावर का दौरा किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, संस्था के साधुओं के ब्रह्मचर्य नियमों (महिलाओं से दूरी) का हवाला देते हुए दौरे के समय वहां तैनात महिला कर्मचारियों को कुछ समय के लिए हटाने या उनकी जगह पुरुष कर्मचारियों को तैनात करने का अनुरोध किया गया था। एफिल टावर का संचालन करने वाली कंपनी SETE (सेटे) ने इस अनुरोध को मान लिया और कुछ समय के लिए महिला कर्मचारियों को उनके काम करने की जगह से हटा दिया या अन्यत्र भेज दिया। महिला कर्मचारियों और यूनियनों ने इसे लैंगिक भेदभाव (Gender Discrimination) और महिलाओं को उनके कार्यस्थल पर अदृश्य करने वाला कदम करार दिया। इसके विरोध में एफिल टावर के कर्मचारियों ने अचानक हड़ताल कर दी, जिसके चलते पर्यटकों के लिए टावर को एक दिन के लिए बंद करना पड़ा।
मांगी माफी
विवाद बढ़ने पर BAPS संस्था ने बयान जारी कर स्पष्ट किया कि उनका इरादा किसी भी तरह का लैंगिक भेदभाव पैदा करने या किसी को अपमानित करने का नहीं था। उन्होंने किसी भी असفलता या असुविधा के लिए सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी। पेरिस के धिकारियों और फ्रांसीसी मंत्रियों ने इस घटना की निंदा की और इसे अस्वीकार्य बताया। वहीं, भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह पूरी तरह से दो निजी संस्थाओं (BAPS और एफिल टावर प्रबंधन) के बीच का मामला है और इसमें भारत सरकार की कोई संलिप्तता नहीं है।
1801 में एक नई परंपरा की शुरुआत
घनश्याम पांडे ने 1801 में एक नई परंपरा की शुरुआत की और इसे स्वामीनारायण संप्रदाय नाम दिया। शोधकर्ता गौरांग जानी कहते हैं कि इस संप्रदाय का गठन समाज के वंचित और हाशिए पर मौजूद वर्गों के लोगों को आकर्षित करने के मक़सद से किया गया था। 19वीं सदी की शुरुआत में, जब हिंदू धर्म के भीतर कई संप्रदाय पहले से ही मौजूद थे। गौरांग जानी की मां नियमित रूप से स्वामीनारायण मंदिरों में दर्शन करने जाती थीं। गौरांग जानी गुजरात यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र विभाग के हेड ऑफ डिपार्टमेंट रहे हैं। उन्होंने देखा था कि उनकी मां को भगवान के सामान्य रूप से दर्शन करने या मंदिर में सामान्य तरीके से प्रवेश करने की भी अनुमति नहीं थी। महिलाओं को मंदिर में प्रवेश मिलता था, लेकिन उन्हें हमेशा पुरुषों से अलग रखा जाता था।
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