2 सितंबर के मेरठ बंद पर उठे बड़े सवाल, जब बड़े संगठन साथ नहीं तो किसके लिए बंद?, जन्माष्टमी से ठीक पहले बाजार बंद कराने की तैयारी, छोटे व्यापारियों के नुकसान की चिंता
मेरठ। 2 सितंबर को प्रस्तावित बंद को लेकर अब व्यापारिक और सामाजिक हलकों में ही सवाल उठने लगे हैं। खास बात यह है कि संयुक्त व्यापार संघ जैसे बड़े व्यापारिक संगठन ने बंद का समर्थन नहीं किया है। वहीं मेरठ बार एसोसिएशन और वकीलों की ओर से भी बंद के समर्थन की बात सामने नहीं आई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शहर के प्रमुख व्यापारिक और कानूनी संगठनों का व्यापक समर्थन बंद को नहीं मिल रहा, तो आखिर इस बंद का सबसे ज्यादा नुकसान किसे उठाना पड़ेगा?
4 सितंबर को जन्माष्टमी, उससे पहले 2 सितंबर को बंद
यह बंद ऐसे समय प्रस्तावित है जब बाजार त्योहारी सीजन की तैयारी में जुटे हैं। 4 सितंबर को जन्माष्टमी है और महीने की शुरुआत में ही दुकानदार त्योहार को लेकर स्टॉक तैयार करते हैं। जूते-कपड़े, मिठाई, पूजा सामग्री, सजावटी सामान सहित तमाम कारोबारियों ने बिक्री की उम्मीद में पहले से माल मंगा रखा है।
ऐसे में सवाल सीधा है—
अगर 2 सितंबर को जबरन बाजार बंद कराया गया और कारोबार प्रभावित हुआ तो छोटे व्यापारी के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?बड़े कारोबारियों के पास नुकसान सहने की क्षमता हो सकती है, लेकिन छोटे दुकानदार के लिए एक दिन की बिक्री भी बेहद महत्वपूर्ण होती है।
आंदोलन करने वालों के व्यापार का क्या?
व्यापारियों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि जो लोग बंद का आह्वान कर रहे हैं, क्या उनके अपने कारोबार भी उस दिन पूरी तरह बंद रहेंगे? यदि आंदोलन वास्तव में व्यापारी हित के लिए है तो उसकी कीमत भी सभी को समान रूप से चुकानी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि आंदोलन की राजनीति कोई और करे और आर्थिक नुकसान छोटे दुकानदार को उठाना पड़े।
बंद समर्थन से हो, दबाव से नहीं
किसी भी आंदोलन में लोकतांत्रिक तरीके से समर्थन जुटाना अलग बात है और व्यापारियों को दुकानें बंद करने के लिए दबाव बनाना अलग। अगर कोई व्यापारी अपनी दुकान खोलकर कारोबार करना चाहता है तो उसे डर या दबाव में बंद करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि बाजार में कानून-व्यवस्था बनी रहे और किसी भी व्यापारी के साथ जबरदस्ती न होने पाए।
समाधान बंद है या बातचीत?
शास्त्रीनगर और आवास विकास से जुड़ा विवाद गंभीर है और प्रभावित लोगों की आवाज सरकार तथा प्रशासन तक पहुंचनी चाहिए। लेकिन क्या इसका समाधान पूरे मेरठ का कारोबार रोकना है? जब संयुक्त व्यापार संघ ने बंद का समर्थन नहीं किया, और मेरठ बार एसोसिएशन व वकील समुदाय की ओर से भी बंद का समर्थन नहीं है, तब बंद के आयोजकों को शहर के व्यापारियों के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि बंद से हासिल क्या होगा और इसके आर्थिक नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा।
मेरठ को टकराव नहीं, समाधान चाहिए
व्यापारियों की मांगें जायज हैं तो उनके लिए मजबूत कानूनी और लोकतांत्रिक लड़ाई होनी चाहिए। ज्ञापन, वार्ता, धरना, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार पर दबाव और न्यायालय का रास्ता—कई विकल्प मौजूद हैं। लेकिन त्योहार से ठीक पहले पूरे बाजार को बंद कराने का फैसला छोटे व्यापारियों के लिए भारी पड़ सकता है।
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