नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर तमाम दलों ने सवाल खड़े कर दिए हैं, हालांकि भाजपा ने चुनाव आयोग के काम की मुक्त कंठ से सराहना की है। हालांकि अदालत ने भी चुनाव आयोग को क्लिनचिट दी हे।लेकिन जो कुछ एसआईआर के नाम पर चुनाव आयोग ने किया है उससे चुनाव की सारी प्रक्रिया ही कठघरे में नजर आ रही है। दरअसल हुआ यह कि पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से क़रीब 91 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं। यह काम राज्य की मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) के बाद हुआ। सत्तारूढ दल टीएमसी और दूसरे दलों को समझ नहीं आ रहा है कि यह किस प्रकार के चुनाव कराए जा रहे हैं। यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12% है, जो बीते साल अक्तूबर में एसआईआर शुरू होने के समय क़रीब 7.66 करोड़ थी। इन 91 लाख में से 63 लाख से ज़्यादा वोटरों के नाम फ़रवरी में चुनाव आयोग की जारी सूची में ही हटा दिए गए थे. इन लोगों को “अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या डुप्लीकेट” बताया गया। इसके अलावा 60.06 लाख वोटरों को “अंडर एडजुडिकेशन” यानी जांच के दायरे में रखा गया है.। चुनाव आयोग के मुताबिक़ इन लोगों के रिकॉर्ड में “तार्किक गड़बड़ियां” थीं, जैसे नाम की स्पेलिंग, जेंडर में ग़लती, माता-पिता से उम्र का असामान्य अंतर आदि बताए गए हैं।
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