नई दिल्ली। चुनाव आयोग में और एक बड़ा विवाद हो गया है जिससे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रह है। दरअसल में यह पूरा मामला भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के भीतर ECINet सॉफ्टवेयर, मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और स्थानीय अधिकारियों के अधिकारों में कटौती को लेकर शुरू हुआ है। इस मामले में महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) एस. चोक्कलिंगम ने केंद्रीय चुनाव आयोग को एक पत्र भेजकर स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के अधिकार बहाल करने की मांग की है। इसके साथ ही, देश के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं।
महाराष्ट्र CEO के पत्र की प्रमुख मांगें
महाराष्ट्र के CEO एस. चोक्कलिंगम ने 24 सितंबर को चुनाव आयोग को पत्र लिखकर केंद्रीयकृत ECINet सॉफ्टवेयर की वजह से ग्राउंड-लेवल के अधिकारियों (EROs) के काम में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए बदलावों की मांग की है। सॉफ्टवेयर के कारण जमीनी स्तर पर काम करने वाले चुनावी पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के हाथ बंध गए हैं। SIR प्रक्रिया के दौरान उन्हें स्थानीय स्तर पर फैसले लेने की अधिक शक्ति दी जाए। यदि कोई मतदाता अपनी प्रविष्टि या डेटा के संबंध में पुख्ता और संतोषजनक दस्तावेज जमा कर देता है, तो ERO को यह अधिकार होना चाहिए कि वह उस व्यक्ति को कार्यालय में आकर व्यक्तिगत गवाही देने से छूट दे सके। इससे बुजुर्गों, दिव्यांगों और कमजोर वर्ग के मतदाताओं को अनावश्यक दफ्तरों के चक्कर काटने से राहत मिलेगी।
ज्ञानेश कुमार के फैसलों के खिलाफ 14 आपत्तियां
SIR के दौरान ECINet सॉफ्टवेयर नए मतदाता के रिकॉर्ड को पुरानी मतदाता सूची में दर्ज उसके माता-पिता या दादा-दादी के रिकॉर्ड से जोड़ने की कोशिश करता है। डेटा का मिलान न होने पर सॉफ्टवेयर आवेदन को ब्लॉक या रिजेक्ट कर देता है, जिससे पात्र नागरिकों का नाम जुड़ने में समस्या आ रही है। यह आंतरिक गतिरोध तब और ज्यादा सामने आया जब चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों के खिलाफ 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं।
बहुमत से हो फैसला
दोनों आयुक्तों का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR), डेटा सिस्टम और डिजिटल सॉफ्टवेयर से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना, केवल CEC के स्तर पर ही ले लिए गए। 2023 के अधिनियम के अनुसार चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए। उन्होंने आईटी डिवीजन के माध्यम से मतदाता सूची के डेटाबेस के “अत्यधिक केंद्रीकरण” पर चिंता जताई। इस केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर के कारण जमीनी स्तर के अधिकारियों (EROs) के वैधानिक अधिकार सीमित हो रहे हैं। नए मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग होने वाले ‘फॉर्म-6’ में नियमों को औपचारिक रूप से बदले बिना माता-पिता/दादा-दादी के डेटा लिंकिंग को अनिवार्य किया गया, जिसे दोनों आयुक्तों ने “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताया। इस कड़े सॉफ्टवेयर नियंत्रण के कारण वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम कटने या ब्लॉक होने का खतरा पैदा हो गया है, जैसा कि हाल ही में गोवा में कुछ पात्र मतदाताओं के साथ हुआ।
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