मेरठ। गणेश वास्तव में किसके अधिपति हैं? यह बात गुरुदेव श्री श्री रविशंकर ने बतायी है। उन्होंने कहा कि गणेश निराकार दिव्यता के वह साकार स्वरूप हैं, जिन्हें एक भव्य रूप प्रदान किया गया है, ताकि भक्त के लिए उन्हें समझना और उनसे जुड़ना सहज हो। हिंदू पुराणों के अनुसार वे भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं। किंतु ‘गणेश’ नाम में ही एक गहन आध्यात्मिक अर्थ निहित है। ‘गण’ का अर्थ है—समूह। यह समस्त ब्रह्मांड परमाणुओं और विविध प्रकार की ऊर्जाओं से मिलकर बना है। हमारा अपना शरीर भी एक ‘गण’ है। यह मांस, रक्त, अस्थियों और न जाने कितने तत्वों से निर्मित है। जो हमें एक शरीर के रूप में दिखाई देता है, वास्तव में वह अनेक घटकों का समुच्चय है।
ब्रह्मांड में विद्यमान प्रत्येक समूह के अधिपति हैं
यदि इन विविध समूहों और तत्वों को संचालित करने वाला कोई परम नियम न हो, तो यह संपूर्ण ब्रह्मांड और इसमें विद्यमान प्रत्येक वस्तु अराजकता में डूब जाए। इन समस्त परमाणुओं, ऊर्जाओं और ब्रह्मांड में विद्यमान प्रत्येक समूह के अधिपति हैं—गणेश। वे वह परम चेतना हैं, जो सबमें व्याप्त होकर इस सृष्टि में व्यवस्था और संतुलन बनाए रखती है। यही हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा की अद्भुत सुंदरता है। ऋषियों ने उन सत्यों को व्यक्त करने के लिए प्रतीकों का सहारा लिया, जिन्हें शब्दों में सहजता से अभिव्यक्त करना संभव नहीं था। पुराणों की कथाओं में अनेक ऐसी घटनाएँ मिलती हैं, जो पहली दृष्टि में अविश्वसनीय या कठिन प्रतीत हो सकती हैं। किंतु इन कथाओं के बाहरी रूप से आगे बढ़कर इनके भीतर छिपे ज्ञान को समझना आवश्यक है, क्योंकि इनमें गहन आध्यात्मिक अर्थ समाहित हैं। कथा आती है कि एक बार भगवान शिव के साथ उत्सव मनाते हुए माता पार्वती के शरीर पर मैल लग गया। जब उन्हें इसका आभास हुआ, तो उन्होंने अपने शरीर से उस मैल को उतारा, उससे एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण फूँककर उसे अपने स्नान-कक्ष के द्वार पर पहरा देने के लिए नियुक्त कर दिया। उसी समय भगवान शिव वहाँ लौटे। बालक उन्हें पहचान नहीं पाया और उसने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। तब भगवान शिव ने क्रोधित होकर उस बालक का सिर काट दिया और भीतर चले गए। यह देखकर माता पार्वती स्तब्ध और अत्यंत व्यथित हो उठीं। उन्होंने भगवान शिव को बताया कि वह बालक उनका पुत्र है और उनसे उसे किसी भी प्रकार जीवित करने की प्रार्थना की। तब भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे ऐसे व्यक्ति का सिर लेकर आएँ, जो उत्तर दिशा की ओर सिर करके सो रहा हो। गणों को एक हाथी मिला। वे उसका सिर ले आए। भगवान शिव ने उस हाथी का सिर बालक के धड़ पर स्थापित कर दिया और इस प्रकार गणेश का जन्म हुआ।
पार्वती उत्सव की ऊर्जा की प्रतीक
इस कथा को सुनकर पहला प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—स्वयं देवी पार्वती के शरीर पर इतना मैल कैसे हो सकता था? इस कथा के क्रम में एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ छिपा है। पार्वती उत्सव की ऊर्जा की प्रतीक हैं। उनका मैल से ढक जाना इस बात का संकेत है कि उत्सव और आनंद की ऊर्जा कब सहजता से आगे बढ़कर राजसिक अथवा उन्मत्त हो सकती है और हमें अपने केंद्र से दूर ले जा सकती है। यहाँ ‘मैल’ अज्ञान का प्रतीक है, जबकि भगवान शिव परम निष्कलंकता, शांति और ज्ञान के प्रतीक हैं। जब गणेश भगवान शिव का मार्ग रोकते हैं, तो इसका अर्थ है कि अज्ञान, जो सिर से संबंधित है, ज्ञान को पहचान नहीं पाता। तब ज्ञान को अज्ञान पर विजय प्राप्त करनी होती है। इसी गूढ़ सत्य का प्रतीक है—भगवान शिव द्वारा बालक का सिर काट देना। फिर हाथी का सिर ही क्यों? हाथी ‘ज्ञान शक्ति’ और ‘कर्म शक्ति’—दोनों का प्रतीक है। हाथी के प्रमुख गुण हैं—ज्ञान और सहजता। उसका विशाल मस्तक ज्ञान और प्रज्ञा का प्रतीक है। हाथी किसी बाधा के चारों ओर घूमकर रास्ता नहीं बनाता और न ही बाधाएँ उसे रोक पाती हैं। वह सहजता से उन्हें हटाता हुआ आगे बढ़ जाता है। यह निर्बाध कर्म और सहज प्रयास का प्रतीक है।
इसलिए भगवान गणेश की पूजा
श्रीश्री गुरुदेव ने कहा कि जब हम भगवान गणेश की पूजा करते हैं, तो वास्तव में हम अपने भीतर हाथी के इन्हीं गुणों—ज्ञान, विवेक, सामर्थ्य और सहज कर्मशीलता—को जाग्रत करने का आह्वान करते हैं। एक प्रतीक हमें उस गहरे सत्य तक पहुँचने का मार्ग देता है, जिसे केवल शब्दों के माध्यम से समझ पाना कठिन है। जब हम गणेश के स्वरूप को देखते हैं, तो हमें केवल एक मूर्ति या आकृति नहीं देखनी चाहिए। हमें उस चेतना और उन दिव्य गुणों से जुड़ना चाहिए, जिनका वह स्वरूप प्रतीक है।जब हम गणेश चतुर्थी मनाते हैं, तो हम उस एक चेतना का उत्सव मनाते हैं, जिसमें अनेक रूपों का उद्भव होता है। हम विविधता के पीछे छिपी एकता का, परिवर्तनशीलता के पीछे विद्यमान शाश्वत का और प्रत्येक साकार रूप के पीछे स्थित निराकार का उत्सव मनाते हैं। यही गणेश का गहनतर अर्थ है। वे केवल हाथी के मस्तक वाले देवता नहीं हैं। वे हमें स्मरण कराते हैं कि जीवन के असंख्य रूपों और इस सृष्टि की अनंत विविधता के पीछे एक ही चेतना, एक ही अस्तित्व और एक ही परम सत्य विद्यमान है।
Leave a comment