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कार्रवाई भी और ठेकेदार को भुगतान भी मुसीबत ही मुसीबत

कार्रवाई भी और ठेकेदार को भुगतान भी मुसीबत ही मुसीबत

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कैंट बोर्ड के करोड़ों रुपए के डोर टू डोर ठेके में कार्रवाई कर कहीं मुसीबत तो नहीं ले ली गई मोल

मेरठ। छावनी परिषद के डोर टू डोर के करोड़ों के ठेके में सेनिटेशन के दो अफसरों पर कार्रवाई, ठेकेदार को भुगतान और प्रधानमंत्री के CPGRAMS (सीपीग्राम) पोर्टल पर भेजे गए सीईओ कैंट जाकिर हुसैन के उत्तर ने बुरी तरह से उलझे हुए इस मामले की डोरों को बजाए सुलझाने के कहीं बुरी तरह उलझा तो नहीं दिया है। जिस वजह से यह आशंका जतायी जा रही है उसके निहितार्थ काफी पर्याप्त है और ठोस भी, जिनका उत्तर सीईओ कैंट ही दे सकते हैं। क्योंकि जानकारों की मानें तो जो उत्तर CPGRAMS (सीपीग्राम) पोर्टल पर भेजे गए है, इस मामले की शिकायत करने वाले डोर टू डोर ठेकेदार के तब के नुमाइंदे सचिन गाेयल उसको पर्याप्त नहीं मान रहे हैं। जो उत्तर भेजा गया है उससे यह मामला बजाए सुलझ जाने के बुरी तरह से उलझ गया है ऐसा बाकायदा शपथ पत्र के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय और डीजी डिफेंस को शिकायत भेजने वाले अग्रवाल कंपनी के तत्कालीन नुमाइंदे का मानना है।

फाइल के एक पुर्जे पर कार्रवाई और ठेकेदार को करोड़ों का भुगतान कैसे संभव है

छावनी परिषद ने छावनी इलाके में घर-घर से कूडा कलेक्शन की एक योजना तैयार की। साल 2021 में तत्कालीन सीईओ नवेन्द्रनाथ के कार्यकाल में यह अमल में लायी गयी। करोड़ों रुपए का ठेका था सो ठेकेदार की व्यवस्था भी कर ली गई। आगरा की अग्रवाल एंड कंपनी को डोर टू डोर कलेक्शन का यह ठेका नवेन्द्र नाथ के कार्यकाल में दे दिया गया। इस ठेके के लिए 3 अप्रैल 2021 को वर्कऑर्डर जारी कर दिया गया। वर्कऑर्डर में तत्काल काम शुरू कर सूचना दिए जाने के निर्देश ठेकेदार को दिए गए थे। यह वर्कऑर्डर अब इस मामले की शिकायत करने वाले अग्रवाल कंपनी के नुमाइंदे सचिन गाेयल का दिया गया था। सचिन ने बताया कि उन्होंने ही ठेके पर काम शुरू करने की बाकायदा लिखित सूचना कैंट बोर्ड प्रशासन को दे दी थी।

सीईओ कैंट ने कर दिया था ओके

अग्रवाल कंपनी के हवाले से कंपनी के नुमाइंदे ने सचिन ने 2 अप्रैल 2021 को जो पत्र कैंट बोर्ड ऑफिस में दिया था, उसको तत्कालीन सीईओ ने अगले दिन यानि 3 अप्रैल को कार्य की स्वीकृति दे दी और स्वीकृति के साथ ही कंपनी ने काम भी शुरू कर दिया। इतना ही नहीं कैंट बोर्ड ने स्वीकृति ही प्रदान नहीं की बल्कि डोर टू डोर ठेका की प्रतिमाह 18.57 लाख रुपए प्रति माह की दर से दो साल के इस ठेके का जो भी भुगतान बैठता था वो भी करा दिया। गया।

कार्रवाई कर फंस गए

लेकिन इस मामले में सेनिटेशन सेक्शन के दो अफसरों पर कार्रवाई करना भारी पड़ गया। डोर टू डोर ठेके की फाइल के जिस कागज के आधार पर ठेकेदार को करोड़ों को पेमेंट कर दिया गया, उसी कागज को बैकडेट वर्कऑर्डर बताकर सेनिटेशन के दो अफसरों पर ना केवल कार्रवाई की बल्कि प्रधानमंत्री के CPGRAMS (सीपीग्राम) पोर्टल पर भेजे गए उत्तर में कार्रवाही का भी वाजिद ठहरा दिया गया। माना जा रहा कि बस यही पर चूक हो गयी। यदि वर्कऑर्डर बैकडेटेड था तो फिर पेमेंट कैसे कर दिया गया और जब पेमेंट हो गया तो फिर सेनिटेशन के दो अफसरों पर कार्रवाई किस बिना पर कर दी गयी। क्यों फाइल के उसी पेपर को “बैकडेटेड वर्क ऑर्डर” बताकर दंड का हथियार बना दिए गए। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो पेपर ठेकेदार को पेमेंट किए जाने में ठीक हो सकता है उसको आधार बनाकर किसी भी अफसर पर कार्रवाई कैसे की जा सकती है। या तो कार्रवाई गलत थी या फिर कैंट बोर्ड के खजाने से ठेकेदार को करोड़ों का पेमेट का किया जाना गलत था। दोनों चीजें सही हैं यह बात शिकायत करने वाला मानने को तैयार नहीं। इसी के चलते शिकायत भी की गयी है, जिसका उत्तर भेजा गया है। सबसे चौंकाने वाली बात— जिन दस्तावेजों पर ठेकेदार के प्रतिनिधि सचिन गोयल के हस्ताक्षर हैं, उन्हीं दस्तावेजों को भुगतान के लिए वैध माना गया और दंड के लिए अमान्य ठहराया गया।

दोहरा मापदंड़

पीएमओ के पोर्टल पर जो शिकायत की गयी है उसमें सचिन गोयल ने दोहरा मापदंड़ अपनाए जाने का आरोप लगाया है। उसका कहना है कि अगर वर्कऑर्डर वैध था तो बैकडेटेड का आरोप एकदम निराधार और झूठा है और अगर वर्कऑडर बैकडेड था तो फिर करोड़ों का भुगतान सरकारी खजाने से किए जाने का जिम्मेदार कौन है। सचिन गोयल ने शपथपत्र देकर खुली चुनौती दी है — “अगर मैंने कोई गलत तथ्य दिया है तो मेरे खिलाफ कार्रवाई करो”। लेकिन प्रशासन अब तक इस मूलभूत विरोधाभास का कोई स्पष्ट जवाब देने से बच रहा है।

क्या छावनी परिषद के अधिकारी अपने ही दस्तावेजों से बच रहे हैं

यह मामला अब किसी साधारण प्रशासनिक चूक या विवाद का नहीं रहा। यह प्रशासनिक ईमानदारी, जवाबदेही और सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है। यहां यह भी याद दिला दें कि यह मामला चीफ विजिलेंस कमिश्नर तक पहले ही पहुंच चुका है। कैंट बोर्ड में कभी भी इसको लेकर कुछ बड़ा हो सकता है।
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