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पैन्यूली का हिंदू परिषद से जुड़ने का आह्वान

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हिंदू परिषद से जुड़ने का आह्वान
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सनातनियों से अखिल भारतीय हिंदू परिषद से जुड़ने का आह्वान° अपील समस्त सनातनी हिंदू समाज हेतु ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम ‘ (हम साथ चलें, साथ बोलें और हमारे मन एक हों।)

मेरठ। अखिल भारतीय हिंदू परिषद मेरठ मंडल उपाध्यक्ष पंडित संदीप पैन्यूली ने सभी सनातनियां से हिंदू परिषद से जुड़ने का आह्वान किया है। बाईपास स्थित अंसल कोर्टयार्ड श्रीशिवदुर्गा मंदिर में वह प्रेस से वार्ता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारा सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति तक ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक श्रेष्ठ कला है। समाचार के माध्यम से हम समस्त हिंदू समाज से एकता और संस्कार की विनम्र अपील करते हैं सत्य, अहिंसा और वसुधैव कुटुंबकम की शिक्षा देने वाला हमारा सनातन धर्म विश्व का प्राचीनतम और महानतम धर्म है। इतिहास गवाह है कि जब-जब हम बिखरे हैं, तब-तब हमें और हमारी संस्कृति को क्षति पहुँची है। आज समय की माँग है कि हम अपनी छोटी-छोटी पहचानों से ऊपर उठकर एक अटूट सनातनी हिंदू पहचान के साथ खड़े हों।

जाति नहीं केवल हिंदू

जातिगत भेद रहित हम पहले पहले हिंदू हैं, फिर कुछ और। ऊंच-नीच के भेदों को त्यागकर संपूर्ण हिंदू समाज को एक परिवार मानकर गले लगाएं। अपनी भावी पीढ़ी के लिए प्रतिदिन घर में दीपक जलाएं, बच्चों को रामायण-गीता पाठ, हनुमान चालीसा का बोध कराएं और उन्हें अपनी गौरवशाली विरासत से जोड़ें। अपनी वेशभूषा, तिलक और त्यौहारों पर गर्व करें। प्रतिदिन मंदिर जाए अपनी भाषा और संस्कृति का संरक्षण ही हमारी पहचान है। सेवा हमारा परम धर्म है असहाय भाइयों की सहायता गौ सेवा और सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। व्यासमुनि ने महाभारत में कहा है कि धर्म को किसी दशा में भी नहीं छोड़ना चाहिए- न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् । धर्म त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो: । धर्मो नित्य: सुखदु:खे त्वनित्ये । जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य: ।। न तो किसी कामनावश, न किसी प्रकार के भय से और न लोभ से यहां तक कि जीवन के हेतु से भी-धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि धर्म नित्य है और ये सब सांसारिक सुख-दु:ख नित्य हैं। जीव, जिसके साथ धर्म का सम्बन्ध है, वह भी नित्य है और उसके हेतु जितने हैं वे सब अनित्य हैं। इसलिये किसी भी कारण से धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए ।

उन्होंने कहा कि स्मरण रहे-

त्रेतायां मन्त्र-शक्तिश्च, ज्ञानशक्ति: कृते युगे। द्वापरे युद्ध-शक्तिश्च, संघे शक्ति: कलौ युगे ।। बिखराव में विनाश है और एकता में ही विजय है। धर्म की रक्षा के लिए सदैव संगठित रहें कलयुग में एकता की शक्ति प्रधान है।
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