पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विशिष्ट जातीय समीकरण ही यहां हार-जीत का मुख्य आधार तय करते हैं
नई दिल्ली/लखनऊ/मेरठ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का अभी शंखनाद होना बाकि है, लेकिन तमाम दल चुनाव के एलान का इंतजार किए बगैर ही चुनावी बिसात बिछाकर बैठ गए हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर पश्चिमांचल (वेस्ट यूपी) की सियासी बिसात पूरी तरह बिछ चुकी है। मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, सहारनपुर से लेकर ब्रज और रुहेलखंड के इलाकों तक फैले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विशिष्ट जातीय समीकरण ही यहां हार-जीत का मुख्य आधार तय करते हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से मिले झटके के बाद अब अक्टूबर 2026 में सभी राजनीतिक दल नए सिरे से सोशल इंजीनियरिंग को दुरुस्त करने में जुट गए हैं।
जाट मुस्लिम दलित त्रिकोण
वेस्ट यूपी की यदि बात करें तो इस बैल्ट के जाट मतदाता (करीब 17% आबादी) बागपत, मुजफ्फरनगर, मेरठ, शामली और अलीगढ़ जैसे जिलों की लगभग 50-60 सीटों पर जाट समुदाय सीधे तौर पर निर्णायक भूमिका निभाता है। वर्तमान में भाजपा का राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के साथ गठबंधन जाट मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखने की सबसे बड़ी ढाल है। लेकिन जाटों के बड़े चेहरे यशपाल मलिक द्वारा विधानसभा चुनाव से एन पहले जाट आरक्षण मुद्दा उठा दिए जाने और इस मुद्दे पर सरकार में होते हुए भी जयंत चौधरी की चुप्पी ने भाजपा के लिए भारी संकट खड़ा कर दिया है। मेरठ में विधानसभा की सात सीटें हैं। मेरठ की यदि बात की जाए तो जाट आरक्षण समिति के जिलाध्यक्ष संजीव तोमर ने यहां खूंटा गाड दिया है। इसका असर मेरठ की सातों सीटों पर पड़ना तय माना जा रहा है।
मुस्लिम दलित व गैर जाटव
रामपुर (42%), अमरोहा (32%), सहारनपुर (30%), बिजनौर, मुरादाबाद और मेरठ (28-28%) जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी सबसे अधिक है। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी इस कोर वोट बैंक को ‘PDA’ के तहत एकजुट रखने की कोशिश कर रही है। वेस्ट यूपी ही नहीं बल्कि यूपी के मुसलमानों के रुझान की यदि बात की जाए तो वो साफ-साफ सपा या कांग्रेस के साथ नजर आ रहे हैं। मुसलमानों का साफ कहना है कि जो भी प्रत्याशी भाजपा को हराता नजर आएगा उसको वोट जाएगा, यहां यह भी गौरतलब है कि मुसलमानों पर ओबेसी का रंग नहीं चढ़ा हुआ है। दलित और गैर-जाटव वोट: बसपा (BSP) के पारंपरिक प्रभाव में कमी आने के बाद दलित मतों के बिखराव को रोकने के लिए सपा ने इस क्षेत्र में ‘PDA चौपाल’ और संविधान रक्षक रैलियां तेज कर दी हैं।
भाजपा का डेमेज कंट्रोल का प्रयास
सपा के उभार और कुछ ओबीसी नेताओं की नाराजगी को बेअसर करने के लिए भाजपा ने अक्टूबर 2026 में 403 विधानसभा प्रभारियों की सूची जारी की है, जिसमें पश्चिमी यूपी (71 सीटों) के जातीय संतुलन को बेहद बारीकी से साधा गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 71 विधानसभा सीटों में से 13 क्षत्रिय, 12 जाट, 9 गुर्जर, 7 वैश्य और 4 ब्राह्मण चेहरों को प्रभारी नियुक्त किया गया है। जाटों के साथ-साथ त्यागी, राजपूत और सैनी समुदायों के बीच चल रही कथित नाराजगी को दूर करने के लिए भाजपा संगठन में स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व बढ़ा रही है, लेकिन खांटी नेता इसको समझ रहे हैं और कह रहे हैं कि प्रतिनिधित्व केवल विधायक बनने से मिलता है संगठन में शामिल किए जाने से नहीं।
वेस्ट यूपी में सजेगा असली दंगल
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इस उलझी हुई सामाजिक राजनीतिक बिसात में एक तरफ जहाँ अखिलेश यादव जातीय जनगणना और ‘PDA’ के दम पर पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का अभेद्य किला बनाना चाहते हैं, वहीं भाजपा 30% से 40% मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर सत्ता विरोधी लहर को खत्म करने और नए चेहरों के जरिए जातियों को साधने की ‘गुजरात/मध्य प्रदेश रणनीति’ अपना रही है। रालोद (RLD) के साथ गठबंधन जाटों को लेकर भाजपा को मजबूती तो दे रहा है, लेकिन यह मजबूती वैसी नहीं नजर आ रही है जैसा दावा रालोद नेता कर रहे हैं। जाट आरक्षण का मुद्दा एकाएक उठाए जाने के बाद रालोद के जाट नेता असहज नजर आ रहे हैँ। वहीं दूसरी ओर सैनी, त्यागी और कश्यप जैसी जातियों के बीच उपजा असंतोष आगामी चुनाव में पश्चिमांचल की बाजी को बेहद रोमांचक बना चुका है।
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