जनरल लैंड रिकॉर्ड में दर्ज 4600 संपत्तियां बढ़कर 12 हजार के पार हो गयीं और सीईओ और डीईओ कार्यालय सोया रहा
मेरठ। छावनी इलाके में पुराने जिन बंगलों की लीज खत्म हो चुकी है उनको लेकर कैंट अफसर बे-खबरी के आलम में नजर आते हैं। वहीं दूसरी ओर पुरानी संपत्तियां जिनकी संख्या कभी 4,600 हुआ करती थी वो 12 हजार के पार पहुंच गयी है। यह चमत्मकार बगैर भ्रष्टाचार के संभव नहीं। छावनी का बंगला क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से देश के सबसे बड़े छावनी क्षेत्रों में से एक है, जो 3,418 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है। मेरठ कैंट के रक्षा संपदा कार्यालय (DEO) और जनरल लैंड रजिस्टर (GLR) के दस्तावेजों के अनुसार मेरठ कैंट में कुल लगभग 250 से 260 ऐतिहासिक/बड़े बंगले (Old Grant व Leasehold) आधिकारिक अभिलेखों में दर्ज हैं। इसके अलावा, कैंट के जनरल लैंड रिकॉर्ड (GLR) में कुल संपत्तियों (प्रॉपर्टीज) की संख्या करीब 4,600 दर्ज है, जो समय के साथ आपस में विभाजित (Sub-divide) होकर व्यावहारिक रूप से 12,000 से अधिक हो चुकी हैं। छावनी नियमों (Cantonment Act) के तहत कैंट के मुख्य बंगला क्षेत्रों की भूमि का मालिकाना हक सीधे भारत सरकार (रक्षा मंत्रालय) के पास सुरक्षित रहता है। इसलिए, ब्रिटिश काल के इन मूल बंगलों में से कोई भी पूर्णतः फ्री-होल्ड (निजी मालिकाना हक वाला) नहीं है। हाल के वर्षों में रक्षा मंत्रालय की ओर से एक बड़ा नीतिगत बदलाव शुरू किया गया है, जिसके तहत सिविल (आबादी) क्षेत्रों और कुछ बी-3/बी-4 श्रेणी की संपत्तियों में रह रहे लोगों (किराएदारों) को कुछ शर्तों और निर्धारित दरों के साथ फ्री-होल्ड स्वामित्व देने की अधिसूचनाओं पर कार्य चल रहा है। 132 बंगलों की संपत्तियों (या उनके उप-विभाजित हिस्सों) की लीज समाप्त हो चुकी है। रक्षा मंत्रालय और रक्षा संपदा कार्यालय (DEO) के रिकॉर्ड के अनुसार, ब्रिटिश काल में दिए गए इन बंगलों की 90 से 99 वर्षों की लीज अवधि पूरी हो चुकी है, जिसके कारण ये सभी अब तकनीकी रूप से अवैध कब्जे या अनधिकृत श्रेणी में आ गए हैं। जिनकी लीज पूरी हो चुकी है उनमें सदर बाजार (गंज बाजार क्षेत्र) के बंगला नंबर 214, 215 और 216 (गंज बाजार, सदर) का लगभग 1.72 एकड़ का क्षेत्र शामिल है, जिसकी मूल लीज बहुत पहले समाप्त हो चुकी है। इस क्षेत्र में कई कमर्शियल दुकानें और आवासीय परिसर बने हुए हैं। वेस्ट एंड रोड और आबू लेन के कुछ बंगलों के हिस्सों (जैसे बंगला नंबर 190) पर भी लीज/ओल्ड ग्रांट नियमों के उल्लंघन और अवधि समाप्त होने के तहत बेदखली (Eviction) की कार्रवाई शुरू की गई थी। लालकुर्ती और रजबन की बात करें तो इन क्षेत्रों में आने वाले लगभग 400 से अधिक दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की 30 से 35 वर्ष वाली व्यावसायिक लीज भी समाप्त हो चुकी है, जिसके कारण कैंट बोर्ड ने इन्हें परिसर खाली करने के नोटिस थमाए हैं लेकिन आगे की कार्रवाई के बजाए लगता है कि कैंट अफसर नींद में हैं।बंगला 210-बी
सुप्रीमकोर्ट के आदेशों के मुताबिक इस बंगले के परिसर में किए गए अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ध्वस्तीकरण के कड़े आदेश जारी किए हैं। इस बंगले के गेट के पास और परिसर के भीतर एक मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग (बहुमंजिला इमारत) और कुछ व्यावसायिक निर्माण (अवैध मॉल व दुकानें) बिना छावनी बोर्ड (Cantt Board) की अनुमति के खड़े कर दिए गए हैं। इस बंगले के स्टेटस की यदि बात करें तो यह बंगला मूल रूप से रक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) की ओल्ड ग्रांट/लीज नियमों के तहत आता है, जिसके कारण इसे टुकड़ों में बेचा या विभाजित नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद, अदालती आदेशों (यथास्थिति/Status Quo) का उल्लंघन करते हुए इस बंगले को अंदर ही अंदर 58 से अधिक सेल डीड (Sale Deeds) के जरिए अवैध रूप से छोटे-छोटे भूखंडों (प्लॉट्स) में बांटकर बेच दिया गया। इस अवैध खरीद-फरोख्त और निर्माण के कारण कोर्ट ने संबंधित पक्षकारों को अदालत की अवमानना का दोषी भी पाया था।कैंट बोर्ड को झटका
हाल ही में (सितंबर 2026), इस विवाद में एक नया मोड़ आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कैंट बोर्ड द्वारा जारी किए गए कुछ बेदखली (Eviction) आदेशों को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने कैंट बोर्ड और एस्टेट ऑफिसर (Estate Officer) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए कि जब अधिकारियों को पता था कि संपत्तियां अवैध रूप से बेची गई हैं, तो वे 8 साल तक चुपचाप वहां के खरीदारों से हाउस टैक्स और वाटर टैक्स क्यों वसूलते रहे। कोर्ट ने लंबी देरी के बाद शुरू की गई बेदखली प्रक्रिया में खामियां पाई हैं। व्यावहारिक रूप से, बंगला 210-बी वर्तमान में पूरी तरह से एक सील और विवादित (Disputed) संपत्ति है। इसका एक बड़ा हिस्सा कैंट बोर्ड के ध्वस्तीकरण आदेशों और सुप्रीम कोर्ट के राडार पर है, जबकि इसमें बने मकानों/दुकानों के खरीदार हाईकोर्ट के हालिया आदेश के बाद तकनीकी राहत और कानूनी लड़ाई में उलझे हुए हैं। इसके इतर बंगला 210 ए की यदि बात करें तो बंगला नंबर 210-बी की तरह यहां पर किसी भी प्रकार की बड़े पैमाने पर अवैध कमर्शियल प्लॉटिंग (मॉल, दुकानें या बहुमंजिला अवैध आवासीय भवनों का अनधिकृत निर्माण) या सुप्रीम कोर्ट द्वारा बड़े पैमाने पर सीलिंग/ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की वर्तमान में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं है। यहां का उपयोग मूल परिसर के ढांचे को बनाए रखते हुए शादी-समारोहों और पार्टी लॉन के रूप में किया जा रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि डीईओ के इस बंगले में अवैध निर्माण, सब डिविजन ऑफ साइट और कामर्शियल एक्टिविटज की जा रही हैं फिर भी डीईओ कार्यालय कार्रवाई के बजाए हाथ पर हाथ धरे बैठा है।लीज (Lease) और ओल्ड ग्रांट (Old Grant) का वर्गीकरण
कैंट के इन सभी बंगलों को मुख्य रूप से दो वैधानिक श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
| श्रेणी (Category) | विवरण और स्थिति |
|---|---|
| ओल्ड ग्रांट बंगले (Old Grant Bungalows – OGBs) | मेरठ कैंट के अधिकांश ऐतिहासिक बंगले इसी श्रेणी में आते हैं। यह गवर्नर जनरल के आदेश (GGO-1836) के तहत बिना किसी समय सीमा के दिए गए थे। इनमें रहने वालों के पास केवल ‘ऑक्यूपेंसी राइट्स’ (रहने का अधिकार) होता है, जमीन सरकार की होती है। |
| लीज पर दिए गए बंगले (Leasehold) | ये बंगले अंग्रेजों के समय 90 से 99 साल की निश्चित अवधि की लीज पर दिए गए थे। हाल के समय में कैंट बोर्ड ने 132 से अधिक ऐसे बंगलों की संपत्तियों को सार्वजनिक नोटिस जारी किया है, जिनकी लीज अवधि समाप्त हो चुकी है। |
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