मेरठ। जिस राहत की उम्मीद लगाए बैठे थे वो टूट गई। सुप्रीमकोर्ट से मंगलवार को शास्त्री नगर के 815 भवन स्वामियों को अमंगलकारी खबर मिली। सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई के दौरान जो कुछ हुआ उसका लबोलुआव यह है कि सुप्रीमकोर्ट ने किसी प्रकार की राहत देने से इंकार कर दिया। यह खबर करीब तीन बजे शास्त्रीनगर पहुंची तो वहां सन्नाटा पसर गया। जो महिलाएं मंदिरनुमा टैंट के सामने पूजा अर्चना कर रही थी उनकी रूलाई फूट पड़ी। वो सुबक-सुबक कर रोने लगीं। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि ईश्वर जरूर उनकी करुण पुकार सुनेंगे लेकिन ऐसा हो ना सका। यहां महिलाओं की भारी भीड़ जमा थीं वो फूट कर रोने लगीं। उनकी हालत को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। केवल इतना कहा जा कसता है कि दुखों का पहाड़ टूटा है। जो बुरी खबर मिली वो किसी दुखों के पहाड़ के टूटने से कम नहीं थी। कुछ महिलाएं चक्कर खाकर गिर पड़ी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें जो आखरी उम्मीद और आस थी वो आज टूट गयी। रोते बिलखते एक दूसरे से कह रहे थे कि अब क्या होगा। वाकई किसी को नहीं पता कि इन 815 परिवारों के साथ अब क्या होगा। तीन महीने के करीब चले आंदोलन के दौरान यहां के लोगों ने लगातार प्रदर्शन करने के साथ- शहर बंद करने की घोषणा, नोटिस का विरोध जलप्रिनिधियों से मुलाकात, वकीलों से मुलाकात और तमाम काम किए गए लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ।
नेताओं ने बना ली दूरी
करीब 90 दिन से महिलाएं आंदोलन पर हैं। इस दौरान उन्होंने जो देखा और बर्दाश्त किया वो भी किसी से छिपा नहीं है। इस लंबे आंदोलन के दौरान तमाम नेता इनके बीच पहुंचे। राजनीतिक बातें खूब हुईं, लेकिन आज जब इन्हें सबसे ज्यादा सहानुभूति की जरूरत थी तो नेताओं ने इनसे दूरी बना ली। भाजपा के सांसद हो या फिर राज्यसभा सदस्य अथवा मंत्री , महापौर हो या फिर भाजपा के विधायक, विपक्ष के नेता हो या उनके सांसद या फिर व्यापार संघों के नेता कोई भी दुख की घड़ी में सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा सका। वहां पर केवल गम और गुस्सा था। निशाने पर भाजपा के नेता और सरकार दोनों थे। वो सवाल पूछ रहे थे कि वोट देने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी यह कभी उन्होंने सोचा नहीं था। मौके पर अफरा-तफरी का माहौल था। महिला बच्चे रो रहे थे और जो परिवार के बड़े थे नाउम्मीद की इबारत उनके चेहरे पर आसानी से पढ़ी जा रही थी। निराशा में वो जान देने तक की बातें करने लगे।
जिन अफसरों पर एफआईआर उन्हें फुल राहत
जिन आशियानों को तोड़ने की नौबत आ गयी है उनकों लेकर कसूरवार आवास विकास के तमाम अफसरों के खिलाफ आवास विकास परिषद के अफसरों ने ही मुकदमें लिखाए हुए हैं, 815 परिवारों के आशियानों को तो तोड़ कर सजा दे दी जाएगी, लेकिन कोई वो चाहे नेता अफसर या जो आरटीआई एक्टिविस्ट इस मामले को लेकर आवास विकास पहुंचे थे उनमें से कोई भी नामजद अफसरों पर कार्रवाई तो दूर की बात उनका नाम तक लेने को तैयार नहीं। यहां तक कि सरकार भी उन अफसरों पर मौन है। जो कुछ भी सजा दी जा रही है केवल 815 परिवारों को दी जा रही है।
अब आवास विकास परिषद का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर 2024 को स्कीम नंबर-7 के आवासीय भवनों में संचालित व्यावसायिक गतिविधियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद आवास एवं विकास परिषद ने 8 अप्रैल 2026 को पूर्ण रूप से व्यावसायिक उपयोग में पाए गए 44 भवनों को सील कर दिया था। साथ ही 815 भवन स्वामियों को नोटिस जारी किए गए थे। सुप्रीमकोर्ट के आदेश आने के बाद अब आवास विकास परिषद के अफसर क्या करेंगे।
घटना की टाइम लाइन
इस पूरे मामले की टाइम लाइन की यदि बात की जाए तो सेंट्रल मार्किट में कुल 860 संपत्तियां हैं, जिन्हें नियमों को ताक पर रखकर तैयार किया गया है। यह सभी या तो आवास रहे या फिर आवासीय जमीन। लेकिन जमीन के मालिक ने नियमों को नजर अंदाज कर यहां कॉमर्शियल निर्माण कर डाला। इनके खिलाफ शिकायत हुई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और पहले चरण में 44 संपत्तियों को सील करा दिया। अब 816 संपत्तियां हैं, जिन पर एक्शन की तैयारी है। साल 1978 में यूपी आवास विकास परिषद ने शास्त्रीनगर गृहस्थानम योजना संख्या तीन लॉन्च की। अगस्त 1986 में काजीपुर निवासी वीर सिंह को 288 वर्ग मीटर का भूखंड संख्या 661/6 आवंटित किया गया और 30 अगस्त को इसका कब्जा भी दे दिया गया। उसी दौरान व्यापारी नेता विनोद अरोड़ा ने पावर ऑफ अटॉर्नी की सहायता से वहां एक कॉम्प्लेक्स खड़ा करके 22 दुकानें बना लीं। सितंबर 1990 19 सितंबर 1990 को आवास विकास ने पहला नोटिस जारी कर अवैध निर्माण पर रोक लगाने का आदेश दिया।
फसाद की शुरूआत
साल 1990 में निर्माण रुकवाने पहुंचे परिषद के एक अधीक्षण अभियंता को एक व्यापारी नेता जिस पर आरोप है कि उसने आवास विकास से कानूनी लड़ाई के नाम पर एक अफसर को थप्पड़ मार दिया, वहां से हुई। आज जो कुछ हो रहा है वो इस व्यापारी नेता की करतूत का परिणाम है। व्यापारी नेता के थप्पड़ मारे जाने के बाद ही आरपार का एलान कर दिया गया। आवास-विकास ने मेरठ के कई नामचीन प्रतिष्ठानों को अवैध बताते हुए खाली करने के नोटिस थमा दिए। 19 सितंबर 1990 को परिषद ने निर्माण को अवैध घोषित कर काम रोकने की हिदायत दी लेकिन न तो काम रुकाऔर न ही ‘लैंड यूज’ (भू-उपयोग) बदला गया। 23 मार्च 2005 को आवास एवं विकास परिषद ने ध्वस्तीकरण के आदेश पारित कर दिए। एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 17 सितंबर 2025 को कोर्ट ने भूखंड 661/6 सहित ऐसे सभी अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने का आदेश दिया। 25 अक्टूबर 2025 को 22 दुकानों वाले उस कॉम्प्लेक्स को ढहा दिया गया। 27 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल मार्केट क्षेत्र में आवासीय प्लॉटों पर चल रही व्यावसायिक गतिविधियों को ध्वस्त करने का आदेश दिया। इसके बाद व्यापारियों ने धरना-प्रदर्शन और अनशन शुरू कर दिया। आवास विकास ने मालिकों को आवासीय प्लॉट को कॉमर्शियल में बदलने के लिए नोटिस दिया जिसके तहत 36,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से शुल्क जमा करना था और इस मामले का पटाक्षेप आज मंगलवार को अमंगलवारी खबर के रूप में सामने आया है।
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