मेरठ/ दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से करायी जा रही कथा के दूसरे दिन कथा व्यास डॉ. सर्वेश्वर ने समुंद्र मंथन और मंथन से निकले हलाहल विष को शिव द्वारा पीने की कथा का प्रसंग सुनाया। विश्व-विख्यात कथा व्यास डॉ. सर्वेश्वर ने समुद्र मंथन प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि जब समुद्र मंथन से हलाहल कालकूट विष निकला तो जगत के कल्याण के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कण्ठ में धारण कर लिया। जिसके कारण उनका एक नाम नीलकण्ठ भी पड़ गया। कथा-व्यास जी ने कथा का मर्म समझाते हुए बताया कि शिव का नीलकण्ठ स्वरूप हमें त्याग व सहनशीलता का गुण अपने जीवन में धारण करने की प्रेरणा देता है। शिव भक्त होने के नाते हमारा भी ये कर्त्तव्य है कि हम भी विषपान करना सीखें। अर्थात् निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर जगत के कल्याण में अपना योगदान दें। ‘मैंÓ से ‘हमÓ तक का सफर तय करें। लेकिन अ$फसोस, आज मानव तो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की पीठ में छुरा घोंपते हुए भी संकोच नहीं करता। इन्सान तो क्या,हमने तो बेज़ुबान पशु-पक्षियों को भी नहीं छोड़ा। जीभ के क्षणिक स्वाद के लिए आज रोज़ाना हज़ारों जीव काट दिए जाते हैं। आज दुनिया भर में लाखों बूचड़खाने खुल गए हैं, जिनमें नित नई आधुनिक मशीनों द्वारा कुछमिनटों में ही लाखों जानवरों को मौत के घाट उतार दिया जाता है, वह भी बड़ी बेरहमी से। यूँ तो हम महादेव के भक्त हैं परंतु शायद हम ये भूल जाते हैं कि महादेव का एक नाम पशुपतिनाथ भी है। अर्थात् जो पशुओं के स्वामी हैं। स्वयं ही सोचिये पशुओं की हत्या कर क्या हम अपने पशुपतिनाथ को प्रसन्न कर पाएंगे? प्रभु का सच्चा भक्त ऐसा नहीं होता। वह तो पर-पीड़ा को समझ अपने क्षुद्र स्वार्थों का परित्याग कर देता है। उसके लिए तो सबसे श्रेष्ठ आसन है ‘आश्वासनÓ जो वो दीन दु:खियों को देता है; सबसे उत्तम योग है ‘सहयोगÓ जो वो यथा शक्ति प्राणी मात्र का करता है, और सबसे लम्बी श्वास है ‘विश्वासÓ जो वह रोती अखियों को प्रदान करता है। इसलिए आवश्यकता है अपने भीतर दया, प्रेम, त्याग व करुणा जैसे गुणों को विकसित करने की। और ये तब ही सम्भव है जब ब्रह्मज्ञान के माध्यम से हम नीलकण्ठ का दर्शन अपने घट में प्राप्त करेंगे। इस अवसर पर कथा पंडाल में महाशिवरात्रि महोत्सव भी धूमधाम से मनाया गया, जिसमें भक्तों ने नृत्य कर खूब आनंद लूटा।
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