नई दिल्ली/लखनऊ। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर ज्ञानेश कुमार को नियुक्त किए जाने का मोदी सरकार के फैसले का विरोध किया था। कांग्रेस ने फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने के दौरान लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी की ओर से दर्ज कराए गए असहमति नोट का भी हवाला दिया है। राहुल गांधी ने चयन समिति से CJI को हटाने को लेकर आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के एक आदेश में भी 2023 के कानून की उस व्यवस्था को चुनौती दिए जाने का उल्लेख है, जिसमें CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को चयन समिति में रखा गया है। कांग्रेस ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। शनिवार को लखनऊ में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभय दुबे ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के फैसलों में पारदर्शिता और संस्थागत सहमति जरूरी है। आराधना मिश्रा और अभय दुबे ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया से लेकर आयोग के भीतर कथित असहमति और SIR में अपनाई जा रही प्रक्रिया तक कई मुद्दे उठाए।
CJI को चयन समिति से हटाने पर सवाल
कांग्रेस नेताओं ने 2 मार्च 2023 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष/सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की सलाह पर करेंगे। यह व्यवस्था संसद की ओर से कानून बनाए जाने तक लागू रहनी थी। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि दिसंबर 2023 में संसद से पारित कानून के बाद चयन समिति की संरचना बदल गई और मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। 2023 के कानून की धारा 7 में चयन समिति की संरचना इसी तरह निर्धारित की गई है।
‘आयोग में असहमति हो तो बहुमत से फैसला’
कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर 2023 के कानून की धारा 18(2) का भी उल्लेख किया। कानून के मुताबिक आयोग का काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से होगा। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की राय अलग होती है तो मामला बहुमत की राय से तय किया जाएगा। यानी तीन सदस्यीय आयोग में दो सदस्यों की राय बहुमत मानी जाएगी।
कांग्रेस ने दावा किया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले महीनों में कई फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की हैं। पार्टी ने सवाल उठाया कि यदि आयोग के दो सदस्यों ने महत्वपूर्ण निर्णयों पर आपत्ति जताई थी तो उन आपत्तियों का निस्तारण किस प्रक्रिया के तहत हुआ। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्तमान में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त तथा सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त के रूप में दर्ज हैं।
SIR में नए नियम और फॉर्म-6 पर भी सवाल
कांग्रेस नेताओं ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में ऐसा सवाल जोड़ा गया, जिसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR सूची में होने की जानकारी मांगी गई।
कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयुक्तों की ओर से इस बदलाव पर भी आपत्ति दर्ज कराई गई थी। पार्टी ने सवाल उठाया कि यदि वैधानिक नियमों में निर्धारित प्रक्रिया के अतिरिक्त कोई नई अनिवार्य शर्त जोड़ी जाती है तो उसका कानूनी आधार क्या है।
अनुच्छेद 324 की शक्ति असीमित नहीं
प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस ने संविधान के अनुच्छेद 324 और 327 के बीच के संबंध को भी मुद्दा बनाया। पार्टी नेताओं ने कहा कि अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों के संचालन की संवैधानिक शक्ति देता है, जबकि चुनाव और मतदाता सूची से संबंधित कानून बनाने की शक्ति संसद को अनुच्छेद 327 के तहत प्राप्त है। कांग्रेस ने मोहिंदर सिंह गिल और एसी जोश मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां कानून मौन हो, वहां आयोग अपनी संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन संसद के बनाए कानून और उसके तहत बनाए नियमों के विपरीत आदेश जारी करने की सीमा का सवाल भी महत्वपूर्ण है।
2019 में अशोक लवासा की असहमति का भी जिक्र
कांग्रेस नेताओं ने 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की असहमति का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों से जुड़े आदर्श आचार संहिता मामलों में क्लीन चिट दिए जाने के दौरान लवासा ने असहमति दर्ज कराई थी।कांग्रेस ने कहा कि इससे यह सवाल सामने आता है कि संवैधानिक संस्था के भीतर असहमति दर्ज होने पर उसे किस तरह सार्वजनिक और संस्थागत रूप से दर्ज किया जाता है।
मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि उनका सवाल केवल यह नहीं है कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने की शक्ति है या नहीं। मुख्य सवाल यह है कि मतदाता सूची जैसे लोकतंत्र के मूल आधार से जुड़े फैसले कितनी पारदर्शिता, वैधानिक प्रक्रिया और संस्थागत सहमति के साथ लिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब आयोग के भीतर ही महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को लेकर असहमति सामने आती है तो उसका सार्वजनिक और स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि मतदाता सूची कोई सामान्य प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि नागरिक के मताधिकार का आधार है। इसलिए इसमें बदलाव की प्रक्रिया कानून, पारदर्शिता और उचित प्रक्रिया के अनुरूप होना जरूरी है।इस मौके पर यूपी कांग्रेस कमेटी मीडिया विभाग के चेयरमैन कुंवर सिंह निषाद और मीडिया कोऑर्डिनेटर पूर्वी जोन पुनीत पाठक भी मौजूद रहे।
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